भोपाल। मध्यप्रदेश की राजनीति इन दिनों ‘प्रतीक्षा काल’ में है। किसी को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव मंत्रिमंडल विस्तार का इंतजार है, तो किसी को भाजपा की प्रदेश कार्यकारिणी और निगम-मंडलों में होने वाली राजनीतिक नियुक्तियों की आस। लेकिन फिलहाल सभी को मिल रही है तो बस ‘तारीख पर तारीख’। वजह साफ है, सरकार और संगठन दोनों का पूरा ध्यान इस समय बिहार विधानसभा चुनाव पर केंद्रित है।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव खुद बिहार में भाजपा के चुनावी अभियानों की कमान संभाले हुए हैं। उनके साथ प्रदेश के कई मंत्री और संगठन के बड़े नेता भी चुनावी रणभूमि में सक्रिय हैं। केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान, प्रदेश प्रभारी महेंद्र सिंह, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा, संगठन महामंत्री हितानंद शर्मा और पूर्व मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा जैसे मप्र के तमाम दिग्गजों को बिहार के अलग-अलग इलाकों में जिम्मेदारियां दी गई हैं। इन्हें प्रचार, बूथ प्रबंधन और संगठनात्मक रणनीति की निगरानी की जिम्मेदारी सौंपी गई है।
भाजपा ने बिहार चुनाव को इस बार प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया है और उसमें मध्यप्रदेश के नेताओं की भूमिका निर्णायक मानी जा रही है। भाजपा सूत्रों के अनुसार, बिहार में पार्टी की सफलता या असफलता का सीधा असर मध्यप्रदेश की राजनीति पर भी पड़ेगा यानी मंत्री पदों से लेकर संगठन की कुर्सियों तक, कई नेताओं का भविष्य अब बिहार के नतीजों पर टिका है।
मोहन बने भाजपा का ‘ओबीसी चेहरा’
भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व इस बार बिहार में पिछड़ों और युवाओं को केंद्र में रखकर चुनाव लड़ रहा है। ऐसे में मुख्यमंत्री मोहन यादव को यादव वोट बैंक साधने की अहम जिम्मेदारी दी गई है। वे बिहार के कई यादव-बहुल क्षेत्रों में सभाएं और रोड शो कर चुके हैं। पार्टी का मानना है कि मोहन यादव, भाजपा के ‘ओबीसी चेहरा’ के रूप में बिहार में भी असर छोड़ सकते हैं।
इंतजार ने बढ़ाईं नेताओं की बेचैनी
इधर, मध्यप्रदेश में इंतजार और बेचैनी दोनों बढ़ रहे हैं। मंत्रिमंडल विस्तार और फेरबदल की चर्चाओं ने कई मंत्रियों की नींद उड़ा रखी है, जबकि संगठन में नई कार्यकारिणी और नियुक्तियों को लेकर संशय बना हुआ है। कार्यकर्ताओं के बीच एक ही विमर्श चल रहा है कि, आखिर कार्यकारिणी कब बनेगी और नई नियुक्तियां कब होंगी? पार्टी सूत्रों का कहना है कि बिहार चुनाव की मतगणना पूरी होने और राजनीतिक समीकरण साफ होने के बाद ही मध्यप्रदेश में संगठनात्मक हलचल तेज होगी। भाजपा नेतृत्व फिलहाल कोई जोखिम नहीं लेना चाहता।
प्रतीक्षा-प्रचार में फंसी मप्र की राजनीति
कुल मिलाकर, मध्यप्रदेश की राजनीति इस वक्त ‘प्रतीक्षा’ और ‘प्रचार’ इन दो मोर्चों पर बंटी हुई है। एक ओर सबकी निगाहें मंत्रिमंडल, प्रदेश कार्यकारिणी के पुनर्गठन और राजनीतिक नियुक्ति पर टिकी हैं, तो दूसरी ओर पूरा राजनीतिक फोकस बिहार में भाजपा के प्रदर्शन पर है। फिलहाल यही कहा जा सकता है कि, मप्र में राजनीतिक नियुक्तियों का मौसम तब तक नहीं आएगा, जब तक बिहार के नतीजे नहीं आते।







