रसोई की आंच एक बार फिर महंगी हो गई है। केंद्र सरकार ने घरेलू एलपीजी सिलेंडर के दाम में 60 रुपए की बढ़ोतरी कर दी है, जबकि 19 किलो वाले कॉमर्शियल सिलेंडर के दाम 115 रुपए तक बढ़ा दिए गए हैं। 7 मार्च से लागू हुई इस बढ़ोतरी का सीधा असर आम उपभोक्ताओं और छोटे व्यवसायों दोनों पर पडऩे वाला है। पहले से महंगाई की मार झेल रहे परिवारों के लिए यह फैसला रसोई का बजट और भी भारी कर देगा।
मध्य प्रदेश के प्रमुख शहरों में ही सिलेंडर की कीमतें 900 रुपए के पार पहुंच चुकी हैं। भोपाल में 918 रुपए, इंदौर में 941 रुपए, जबलपुर में 919 रुपए और उज्जैन में 972 रुपए में सिलेंडर मिल रहा है, जबकि ग्वालियर में कीमत लगभग 1000 रुपए के करीब पहुंच गई है। सबसे ज्यादा कीमत नर्मदापुरम में 1035 रुपए हो गई है। मुरैना, भिंड और निवाड़ी जैसे जिलों में भी कीमतें हजार रुपए के करीब पहुंच चुकी हैं। यानी प्रदेश के आधे से ज्यादा जिलों में अब रसोई गैस 900 रुपए से ऊपर मिल रही है।
सरकार का तर्क है कि अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों और मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के कारण गैस की सप्लाई प्रभावित होने का खतरा है। अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच बढ़ते टकराव ने वैश्विक ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता पैदा कर दी है। इसी कारण केंद्र सरकार ने देश की रिफाइनरी कंपनियों को एलपीजी उत्पादन बढ़ाने के निर्देश भी दिए हैं, ताकि भविष्य में गैस की किल्लत न हो। लेकिन सवाल यह है कि बढ़ती कीमतों का बोझ आखिर कब तक आम उपभोक्ता उठाता रहेगा? कुछ समय पहले महिला दिवस के अवसर पर सरकार ने सिलेंडर के दाम में 100 रुपए की कटौती कर राहत दी थी, लेकिन अब फिर से कीमतों में वृद्धि ने उस राहत को लगभग खत्म कर दिया है। गौर करने वाली बात यह भी है कि कॉमर्शियल सिलेंडर के दाम बढऩे का असर सीधे होटल, ढाबों और छोटे व्यवसायों पर पड़ेगा, जिसका परिणाम अंतत: खाने-पीने की चीजों की कीमतों में बढ़ोतरी के रूप में सामने आ सकता है। यानी गैस सिलेंडर की यह बढ़ोतरी केवल रसोई तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि महंगाई की आग को और भडक़ा सकती है।
ऐसे में सरकार के सामने दोहरी चुनौती है। एक ओर ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करना और दूसरी ओर आम जनता पर महंगाई का बोझ कम रखना। जरूरत इस बात की है कि दीर्घकालिक ऊर्जा रणनीति के साथ-साथ उपभोक्ताओं को भी राहत देने के उपाय खोजे जाएं, ताकि रसोई की आग केवल चूल्हे तक सीमित रहे, लोगों की जेब तक न पहुंचे।







