– महेश दीक्षित
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह डॉ. मोहन भागवत का हालिया यह वक्तव्य कि, ‘भारत और हिन्दू’ एक-दूसरे के पर्याय हैं, भारत को हिन्दू राष्ट्र घोषित करने की कोई आवश्यकता नहीं, सिर्फ एक बयान नहीं, बल्कि मौजूदा राजनीतिक विमर्श में एक बड़ा वैचारिक हस्तक्षेप है। गुवाहाटी में दिया गया यह वक्तव्य उस समय आया है, जब देश पहचान, इतिहास और राष्ट्रवाद की बहसों में उलझा हुआ है। ऐसे समय में संघ के शीर्ष नेतृत्व से आया यह संतुलित और स्पष्ट संदेश अत्यंत महत्वपूर्ण है।
भारत किसी सरकारी उपाधि या संवैधानिक उपनाम से नहीं, बल्कि अपनी हजारों वर्षों पुरानी सांस्कृतिक साधना, अनुभव और परंपराओं से ‘भारत’ है। राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर, कबीर, रैदास और तुकाराम की अनुभूतियों ने इसे गढ़ा है, किसी राजनीतिक घोषणा ने नहीं। डॉ. भागवत का यह कहना कि ‘हिन्दू’ कोई संकीर्ण धार्मिक परिचय नहीं, बल्कि इस भूमि की सांस्कृतिक चेतना का नाम है, इस विचार को और मजबूती देता है कि भारत कभी किसी एजेंडा आधारित परिभाषा में फिट नहीं हो सकता।
संघ पर अक्सर यह आरोप लगाया जाता रहा है कि वह एक खास समुदाय के प्रति पूर्वाग्रह रखता है। लेकिन डॉ. भागवत का यह कहना कि संघ न इस्लाम विरोधी है, न मुसलमान विरोधी, इन आरोपों को सीधे खारिज करता है। यह संघ की मूल विचारधारा-चरित्र निर्माण, सामाजिक समरसता और राष्ट्रहित, को स्पष्ट रूप से सामने रखता है। कांग्रेस और अन्य दल वर्षों से संघ को सांप्रदायिक बताकर अपने राजनीतिक समीकरण साधते रहे हैं, लेकिन भागवत का यह वक्तव्य उस नैरेटिव को निर्णायक चुनौती देता है।
आज का भारत बहसों-विमर्शों में उलझा हुआ है, लेकिन संवाद में उतना ही कमजोर। इतिहास और पहचान पर बहसें अक्सर गर्म होती हैं, पर समाधान की ओर नहीं बढ़तीं। ऐसे दौर में संघ प्रमुख की यह भाषा संतुलित, समावेशी और भविष्य-दृष्टि से परिपूर्ण, सिर्फ संघ का संदेश नहीं, बल्कि राष्ट्र के राजनीतिक मानस के लिए भी एक दिशा-सूचक है। यह बताती है कि भारत की असली ताकत आक्रामक राष्ट्रवाद नहीं, बल्कि समरस राष्ट्रवाद है, जहाँ विश्वास, सहअस्तित्व और सांस्कृतिक एकात्मता की बुनियाद मजबूत हो।
संघ दशकों से समाज आधारित राष्ट्रनिर्माण के काम में लगा है। समय की जरूरतों के अनुसार उसकी कार्य-शैली और भाषा में आया यह बदलाव महत्वपूर्ण है। यह परिवर्तन संघ तक सीमित नहीं, बल्कि भारत की सामूहिक यात्रा का संकेत है। यदि भारत सचमुच ‘विश्वगुरु’ बनने का दावा करना चाहता है, तो उसे आर्थिक शक्ति के साथ सामाजिक सौहार्द, नैतिक मूल्यों और सांस्कृतिक आत्मविश्वास की भी ज़रूरत होगी।
डॉ. भागवत का यह वक्तव्य उसी बड़े विजऩ का हिस्सा है, एक ऐसे भारत की कल्पना करते हुए, जहां सांस्कृतिक गौरव किसी विभाजन की दीवार न बने, बल्कि विविधता को एक सूत्र में बांधने वाली शक्ति बने। जहां भारत भूगोल का नाम भर न रहे, बल्कि जीवन-मूल्यों, परंपराओं और सामाजिक एकता की जीवंत अनुभूति के रूप में विश्व मंच पर खड़ा हो।






