राजधानी के राजनीतिक गलियारों में इन दिनों निगम-मंडलों की लंबित राजनीतिक नियुक्तियां सबसे गर्म मुद्दा बनी हुई हैं। भाजपा की प्रदेश कार्यकारिणी में संघ का फार्मूला पूरी मजबूती से चला, और अब वही फार्मूला राजनीतिक नियुक्तियों में बड़ी रुकावट साबित हो रहा है। पार्टी में वर्षों तक पसीना बहाने वाले कई पुराने सिपहसालार कुर्सी की आस लगाए बैठे हैं, मगर संघ की सहमति के बिना किसी नाम पर आगे बढऩा कठिन माना जा रहा है। चर्चा यह भी है कि ‘शिव-श्रीमंत’ अपने-अपने समर्थकों को समायोजित करवाने की जुगत में लगे हैं। इस वजह से भी राजनीतिक नियुक्तियों की सूची आगे बढऩे के बजाय उलझ रही है। सत्ता-संगठन इस दुविधा में कि ऐसा कौन-सा फार्मूला अपनाया जाए कि असंतोष भी न फूटे और संघ की पसंद भी पूरी हो जाए। संकेत साफ हैं-राजनीतिक नियुक्तियों का शुभ मुहूर्त अभी दूर है। नारदजी कहते हैं कि, तब तक इंतज़ार ही राजनीति का मूलमंत्र है और उम्मीद ही सहारा।
विधायकजी लेंगे राजनीति से संन्यास?
विदिशा जिले के एक तेजतर्रार भाजपा विधायकजी ने अचानक ही राजनीति की भागमभाग से पांव खींचने का मन बना लिया है। कहा जा रहा है कि वे अगले विधानसभा चुनाव में दावेदारी नहीं करेंगे और सक्रिय राजनीति से संन्यास का ऐलान करने वाले हैं। यह फैसला उन्होंने हाल ही में एक निजी कार्यक्रम में अनौपचारिक बातचीत के दौरान साझा किया। विधायक वेतन? उसे भी ठुकरा दिया। घरवार छोडक़र सीधे गौशाला में जा बसे हैं, जहां पीत वस्त्र धारणकर ज्यादातर समय वे जप-ध्यान और भगवान के भजन-कीर्तन में गुजार रहे हैं। अब विधायकजी सचमुच राजनीति से संन्यास लेंगे या आगामी 2028 के विधानसभा चुनाव के लिए सिर्फ शिगूफाबाजी है, यह तो वक्त ही बताएगा। यह सवाल इसलिए कि, ‘अविवाहित’ विधायकजी राजनीतिक चर्चाओं में बने रहने के लिए शिगूफेबाजी में माहिर माने जाते हैं।
नल-जल में नेता पुत्रों के काले हाथ
मध्यप्रदेश की ‘नल-जल’ योजना में गड़बड़झाले की परतें खुलनी शुरू हुईं, तो राजनीतिक गलियारों में हलचल बढ़ गई है। 280 एजेंसियों पर काली स्याही लग चुकी है और हैरत की बात यह कि इनमें से ज्यादातर एजेंसियों के पीछे नेता पुत्रों और नजदीकी रिश्तेदार गैंग सक्रिय थी। सरकारी नल के पानी को अपनी कमाई की नदी समझने वाले इन ‘नेता-पुत्रों’ ने फर्जी बैंक गारंटी से लेकर घटिया पाइप और खटारा टंकियों तक, हर जगह कमीशन का नल खोल रखा था। अब जब प्रशासनिक मुखिया ने इनकी कुंडली टटोली तो पानी की जगह बड़े नेताओं की नींद सूख गई है। पीएमओ की सीधी नजर इस लूट पर टिक चुकी है, जिससे बच निकलने के रास्ते अब बेहद संकरे दिख रहे हैं। नारदजी का सवाल है कि, तो क्या सिर्फ एजेंसी ब्लैकलिस्ट करने से पाप धुल जाएंगे? या इस बार नेता पुत्रों के काले हाथ सलाखों तक पहुंचेंगे?
‘माननीयों’ से मिठाई विक्रेता परेशान
राजधानी के दो जाने-माने मिठाई विक्रेता इन दिनों स्थानीय राजनीति के ‘मीठे आतंक’ से परेशान हैं। स्थिति यह है कि जैसे ही मोबाइल की घंटी बजती है, दोनों की धडक़नें बढ़ जाती हैं कि, कहीं फिर किसी माननीय का फोन तो नहीं? आखिर कौन-सा कार्यक्रम आ गया, कौन-सा स्वागत समारोह टपक पड़ा? दरअसल, दो नेताओं ने उनकी रातों की नींद उड़ा रखी है। जब भी माननीयों का जन्मदिन, स्वागत, सम्मान या पार्टी का कोई आयोजन होता है, सबसे पहले फोन इन्हीं मिठाई वालों को जाता है कि, फलां-फलां किलो मिठाई भेज दो, और वह भी पूरी तरह मुफ़्त। इंकार करो, तो खाद्य और पुलिस विभाग की टीमों का डर दिखा दिया जाता है। हालांकि मुफ़्तखोरी से परेशान होकर दोनों दुकानदार अब मोबाइल बंद रखने लगे हैं। नारदजी कहते हैं कि, भैया यह मिठाई की दुकान है, सरकारी भंडार गृह नहीं..!
ग्वालियर में चल रही ‘सिंह इज किंग’ फिल्म!
यदि मध्यप्रदेश में ‘सिंह’ उपनाम वालों का राज देखना हो, तो ग्वालियर की धरती नाप आओ। यहां किस-किस मोड़ पर, किस-किस कुर्सी पर कोई न कोई ‘सिंह’ विराजमान है-गिनना मुश्किल, भूलना असंभव। राजनीति का परचम थामे विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर। सरकार में मंत्री प्रधुम्न सिंह तोमर और नारायण सिंह। महापौर की कुर्सी पर शोभा सिंह सिकरवार और सत्ता के गलियारों में विधायक सतीश सिंह सिकरवार अपनी-अपनी तलवारें चमकाए खड़े। अब प्रशासन की सुनो-कलेक्टर रूचिका सिंह और एसपी धर्मवीर सिंह। नीचे उतरिए तो एसडीएम से एसडीओपी, थानेदार और तहसीलदार से पटवारी तक सब जगह ‘सिंह-साम्राज्य’ का डंका बजता नजर आएगा। नारदजी कहते हैं राजनीति हो या अफसरशाही, ग्वालियर में तो बस एक ही मंत्र चलता है ‘सिंह इज किंग’..!







