मध्य प्रदेश अब उस दौर में खड़ा है, जहां संकट केवल नदियों और जलाशयों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि हवा भी जानलेवा बनती जा रही है। भोपाल, इंदौर समेत आठ बड़े शहरों में सांस लेना दूभर होना इस बात का संकेत है कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन पूरी तरह बिगड़ चुका है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) का ताजा हस्तक्षेप इसी बिगड़ती स्थिति पर एक सख्त चेतावनी है, जो अगर अब भी अनसुनी की गई, तो इसके परिणाम भयावह होंगे। एनजीटी द्वारा नॉन अटेनमेंट सिटी (वायु गुणवत्ता मानकों में विफल शहर,) घोषित किए गए भोपाल, इंदौर, ग्वालियर, जबलपुर, उज्जैन, देवास, सागर और सिंगरौली पिछले पांच वर्षों से तय मानकों से कहीं अधिक प्रदूषण झेल रहे हैं।
भोपाल में पीएम-10 और पीएम-2.5 के आंकड़े यह साबित करते हैं कि समस्या मौसमी नहीं, बल्कि संरचनात्मक बन चुकी है। कभी झीलों और हरियाली के लिए पहचाना जाने वाला शहर आज शीतकाल में धुंध और जहरीली हवा की गिरफ्त में है, जहां एक्यूआई का 300 पार जाना सामान्य होता जा रहा है। इस संकट की जड़ें गहरी और बहुआयामी हैं। पराली जलाना, निर्माण कार्यों की बेतहाशा धूल, बढ़ता वाहन उत्सर्जन, खुले में कचरा जलाना, लैंडफिल की आग और औद्योगिक गतिविधियां, ये सभी मिलकर हवा को ज़हर में बदल रहे हैं।
चिंताजनक यह है कि दिल्ली-एनसीआर की तरह कोई ठोस, राज्यस्तरीय एयर-शेड नीति मध्य प्रदेश में अब तक लागू नहीं हो सकी। नतीजा यह कि हर साल हालात बिगड़ते जाते हैं और सरकारें सिर्फ आंकड़ों पर चिंता जताकर रह जाती हैं। एनजीटी द्वारा गठित उच्चस्तरीय संयुक्त समिति और छह सप्ताह में मांगी गई रिपोर्ट एक अवसर है। लेकिन केवल कागजी कार्रवाई से काम नहीं चलेगा। ज़रूरत है सख़्त राजनीतिक इच्छाशक्ति, ज़मीनी निगरानी और दोषियों की स्पष्ट जवाबदेही तय करने की। पराली जलाने पर वैकल्पिक समाधान, शहरी परिवहन में बदलाव, निर्माण स्थलों पर सख़्ती और औद्योगिक प्रदूषण पर वास्तविक नियंत्रण अब विकल्प नहीं, मजबूरी बन चुके हैं। यदि अब भी हवा को गंभीरता से नहीं लिया गया, तो मध्य प्रदेश आने वाले वर्षों में विकास नहीं, बल्कि बीमारियों का मॉडल बन जाएगा। सवाल यही है कि, क्या सरकारें समय रहते जागेंगी, या प्रदेश की सांसें यूं ही जहरीली होती जाएंगी?







