बीमारी उसकी, बिस्तर अस्पताल का, और बिल सरकार के नाम… लेकिन सबसे बड़ा बोझ फिर भी गरीब मरीज ही उठा रहा है। आयुष्मान भारत योजना, जिसे देश की सबसे बड़ी स्वास्थ्य सुरक्षा ढाल कहा गया, अब कुछ निजी अस्पतालों में इलाज से ज्यादा ‘क्लेम’ की भाषा में समझी जाने लगी है। यह विडंबना ही है कि जिस योजना का जन्म करुणा से हुआ, वह लालच के जाल में फंसती जा रही है।
राजधानी के पांच निजी अस्पतालों पर हालिया कार्रवाई ने उस सच्चाई पर से पर्दा उठाया है, जिनमें गड़बडय़िों की आहट लंबे समय से सुनाई दे रही थी। जांच में बेड संख्या का खेल, कागजों पर मौजूद डाक्टरों का अस्पताल में न मिलना, आयुर्वेद चिकित्सकों से एलोपैथिक इलाज कराना और मरीजों से अवैध वसूली जैसे मामले सामने आए। ये केवल नियमों की अनदेखी नहीं, बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था की आत्मा पर चोट है। असल खेल मरीज की बीमारी से ज्यादा उसके ‘पैकेज वैल्यू’ पर खेला जा रहा है।
सामान्य बीमारी में भर्ती दिखाना, अनावश्यक जांचें जोडऩा, जरूरत न होने पर भी सर्जरी दर्शाना, और फिर पोर्टल पर मोटा क्लेम अपलोड कर देना, यह पैटर्न अब नया नहीं रहा। मरीज घर लौटते समय यह सोचकर संतोष कर लेता है कि इलाज मुफ्त हुआ, जबकि उसके नाम पर सिस्टम से हजारों या लाखों रुपये निकल चुके होते हैं। उसे यह भी नहीं पता चलता कि उसकी बीमारी किसी की बड़ी कमाई का जरिया बन गई। सबसे खतरनाक बदलाव यह है कि कई अस्पतालों का तो आर्थिक ढांचा ही पूरी तरह से ‘आयुष्मान योजना’ पर निर्भर हो चुका है। जब अस्पताल की आय का बड़ा हिस्सा सरकारी क्लेम से आने लगे, तो चिकित्सा सेवा का फोकस बदलने लगता है। मरीज की बीमारी और दर्द पीछे छूट जाती है, पैकेज की अधिकतम सीमा आगे आ जाती है। डाक्टरों पर भी प्रबंधन का दबाव बढ़ता है। इलाज के फैसलों में चिकित्सा से ज्यादा वित्तीय सोच की छाया पडऩे लगती है। इस खेल का नुकसान सिर्फ सरकारी खजाने तक सीमित नहीं है। जब फर्जी या बढ़े-चढ़े क्लेम सिस्टम को भर देते हैं, तो वास्तविक गंभीर मरीजों के लिए संसाधन और बजट पर दबाव बढ़ता है। यानी एक का लालच, दूसरे की जिंदगी पर भारी पड़ सकता है।
हालिया कार्रवाई में अस्पतालों के साथ अधिकारियों पर भी गाज गिरना यह संकेत देता है कि समस्या केवल जमीनी स्तर पर नहीं, निगरानी तंत्र में भी ढील रही है। लेकिन असली बदलाव तब आएगा जब निगरानी कागजों से निकलकर तकनीक और पारदर्शिता पर टिके। रियल-टाइम ऑडिट, इलाज और क्लेम डेटा की डिजिटल क्रास जांच, अस्पतालों की रेटिंग सार्वजनिक करना और मरीजों से सीधे फीडबैक लेना, ये कदम सिस्टम को आईना दिखा सकते हैं। आयुष्मान योजना गरीब का अधिकार है, अस्पतालों का व्यापार मॉडल नहीं। अगर ‘इलाज’ एक कोड और ‘मरीज’ एक कमाई का ‘एटीएम’ बनकर रह गया, तो यह योजना अपने मकसद से भटक जाएगी। क्योंकि जब व्यवस्था बीमार होती है, तो उसकी पीड़ा सबसे पहले गरीब मरीज को ही झेलनी पड़ती है।







