डिजिटल शासन प्रणाली का उद्देश्य सुविधाओं को सरल बनाना है, लेकिन जब तकनीक ही बाधा बन जाए तो चिंता स्वाभाविक है। मप्र सरकार ने जन-कल्याणकारी योजनाओं के लिए समग्र ई-केवाईसी अनिवार्य कर दिया है, पर राजधानी भोपाल में इसकी रफ्तार उम्मीदों से बहुत पीछे चल रही है। एक साल से अभियान चलने के बावजूद महज 50 प्रतिशत समग्र आईडी का ही वेरिफिकेशन हो पाना बताता है कि जमीनी स्तर पर कहीं न कहीं बड़ी खामियां हैं। शहर के 21 में से 12 जोन अभी भी आधी दूरी भी तय नहीं कर पाए हैं। जोन 17 जहां 60 प्रतिशत से ऊपर पहुंच गया है, वहीं जोन 15 और जोन 4 क्षेत्र 45 प्रतिशत से नीचे जूझ रहे हैं। सवाल यह है कि जब राजधानी में यह हाल है तो दूरदराज इलाकों की स्थिति कैसी होगी?
अधिकारियों के अनुसार बड़ी समस्या अधूरी जानकारी वाली समग्र आईडी हैं-न पता, न मोबाइल नंबर। इसके अलावा शादीशुदा महिलाओं के नाम अपडेट न होने से भी रिकार्ड अटक रहे हैं। यह सिर्फ तकनीकी गड़बड़ी नहीं, बल्कि सामाजिक वास्तविकता का भी आईना है, जहां महिलाओं की पहचान अक्सर कागजों में समय पर दर्ज ही नहीं हो पाती। मुद्दा सिर्फ आंकड़ों का नहीं है, असर सीधे लोगों की जिंदगी पर पड़ेगा। समग्र आईडी वेरिफिकेशन न होने पर राशन की दुकान पर नाम मशीन में नहीं दिखेगा। स्कूल एडमिशन, स्कॉलरशिप, आरटीई का अधिकार अटक सकता है। वृद्धावस्था और विधवा पेंशन रुक सकती है। लाड़ली बहना जैसी योजनाओं का लाभ भी अधर में लटक सकता है। कहने मतलब पहचान अधूरी तो अधिकार अधूरे।
नगर निगम अब कैंप लगाकर रफ्तार बढ़ाने की तैयारी में है, लेकिन यह प्रयास पहले क्यों नहीं तेज किए गए? डिजिटल व्यवस्था तभी सफल मानी जाएगी जब वह आम नागरिक के लिए सहज हो, न कि डर और भ्रम का कारण बने। सरकार को चाहिए कि वह वार्ड स्तर पर विशेष शिविर, मोबाइल वैन और महिला-केन्द्रित सहायता डेस्क जैसी पहल करे। तकनीक सुविधा बने, शर्त नहीं। वरना ‘समग्र’ योजना भी अधूरी ही रह जाएगी।







