मध्यप्रदेश भाजपा के प्रदेश संगठन महामंत्री हितानंद शर्मा की राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) में वापसी के बाद अब सबकी निगाहें इस अहम पद के अगले चेहरे पर टिक गई हैं। सियासी गलियारों और संघ-भाजपा के अंदरूनी संकेतों के बीच जो नाम तेजी से उभरकर सामने आया है, वो है विमल गुप्ता का। वर्तमान में विमल गुप्ता मध्यभारत क्षेत्र के प्रांत प्रचारक की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। उन्हें प्रदेश संगठन महामंत्री की दौड़ में सबसे आगे माना जा रहा है। संघ के शीर्ष नेतृत्व में उनकी अच्छी स्वीकार्यता बताई जाती है। साथ ही, उन्हें अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा के सदस्य एवं पूर्व सहकार्यवाह भैयाजी जोशी का करीबी भी माना जाता है, जिससे उनकी दावेदारी और मजबूत मानी जा रही है। हालांकि, इस महत्वपूर्ण पद के लिए मालवा क्षेत्र के प्रांत प्रचारक राजमोहन सिंह, विद्या भारती के प्रांत संगठन मंत्री निखिलेश माहेश्वरी और बिहार भाजपा के संगठन महामंत्री भींखू भाई भी संभावित दावेदारों की सूची में बताए जा रहे हैं। इनमें राजमोहन सिंह को पूर्व प्रदेश संगठन मंत्री सुहास भगत का करीबी माना जाता है, जो उनकी दावेदारी को वजन देता है। अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि संघ नेतृत्व किस नाम पर अंतिम मुहर लगाता है। क्या संगठन की कमान विमल गुप्ता को सौंपी जाएगी, या फिर कोई और नाम सबको चौंकाएगा, इसका फैसला भले ही कुछ दिनों में हो, लेकिन फिलहाल मप्र की राजनीतिक नजरें नागपुर की ओर लगी हुई हैं।
कांग्रेस के माननीयों की भाजपा से गलबहियां!
मध्यप्रदेश की सियासत में इन दिनों जो अटकलें चल रही हैं, वो कांग्रेस के लिए सदमा पहुंचा सकती हैं। खबर है कि पार्टी के तीन ‘माननीय’ भाजपा से नजदीकियां बढ़ा रहे हैं। बताया जा रहा है कि इन तीनों में से एक ‘माननीय’ तो बाकायदा ऐसे ‘मध्यस्थ’ की तलाश में हैं, जो ‘सम्मानजनक और सशर्त’ उनकी भाजपा में एंट्री सुनिश्चित करवा सके। बातचीत केवल वैचारिक नहीं, बल्कि राजनीतिक भविष्य और भूमिका को लेकर भी चल रही है। दूसरे ‘माननीय’ का तरीका थोड़ा अलग बताया जा रहा है। वे किसी न किसी कार्यक्रम, शिष्टाचार भेंट या क्षेत्रीय मुद्दों के बहाने लगभग हर महीने मुख्यमंत्री से मुलाकात कर रहे हैं। तीसरे ‘माननीय’ ने तो हाल ही में मंदसौर दौरे के दौरान मुख्यमंत्री से मुलाकात कर राजनीतिक हलकों को और चौंका दिया। बताया जाता है कि यह मुलाकात सामान्य शिष्टाचार से आगे बढक़र ‘आशीर्वाद’ लेने जैसी थी, जिसकी तस्वीरें और चर्चाएं सवाल खड़े कर रही हैं। चर्चा है कि ये तीनों ‘माननीय’ अब सिर्फ सही समय और अनुकूल राजनीतिक माहौल का इंतजार कर रहे हैं। नारदजी कहते हैं कि अगर यह सियासी अटकलें हकीकत में बदलती हैं, तो आने वाले दिनों में मध्यप्रदेश की राजनीति में एक और बड़ा उलटफेर देखने को मिल सकता है।
भाजपा मुख्यालय में ‘कर्मचारी छंटनी अभियान’!
प्रदेश भाजपा में नए नेतृत्व के आने के बाद से संगठन में फिजूलखर्ची रोकने के लिए नए-नए प्रयोग किए जा रहे हैं। इन्हीं प्रयोगों की कड़ी में अब बारी मुख्यालय के स्टाफ की आ गई है। पिछले एक महीने में आधा दर्जन कर्मचारियों की छुट्टी की जा चुकी है। और चर्चा है कि मुख्यालय में कार्यरत सौ कर्मचारियों में से करीब दो दर्जन कर्मचारियों की विदाई की तैयारी है। दिलचस्प बात यह है कि इनमें ज्यादातर वे लोग शामिल हैं जिनकी नियुक्तियां पूर्व प्रदेश अध्यक्षों के कार्यकाल में हुई थीं। पार्टी के एक पुराने पदाधिकारी का कहना है कि यह लगभग परंपरा बन चुकी थी कि, जो भी नया प्रदेश अध्यक्ष आता, वह दो-चार भरोसेमंद लोगों को ‘मुख्यालय कर्मचारी’ के रूप में अपने साथ ले आता। नतीजा यह हुआ कि समय के साथ मुख्यालय ‘राजनीतिक नियुक्तियों’ का केंद्र बनता चला गया। अब जब नए नेतृत्व ने खर्चों की समीक्षा शुरू की, तो नजर इस व्यवस्था पर भी गई। लेकिन अब देखना यह है कि भाजपा का यह ‘कर्मचारी कम करो अभियान’ वास्तव में खर्च घटाने की मिसाल बनता है या फिर राजनीतिक किरकिरी का नया कारण।
‘धाकड़’ अधिकारी मंत्रीजी पर भारी
राजधानी के सत्ता के गलियारों में इन दिनों एक धाकड़ अधिकारी खासा चर्चाओं में है। धाकड़ ऐसा कि उसके नाम से जुड़ी सैकड़ों शिकायतें कतार में खड़ी हैं, जांचें फाइलों में धूल फांक रही हैं। लेकिन विभागीय मंत्रीजी भी इस अधिकारी को टस से मस करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे। कहते हैं कि इस धाकड़ अधिकारी ने आबकारी महकमे से लेकर मंत्रालय के गलियारों तक यह संदेश फैला रखा है कि उसकी पदस्थापना ‘ऊपर से’ हुई है। ऊपर कौन? यह सवाल कोई नहीं करता, और जो करता है, वह जल्दी चुप हो जाता है। हालात ऐसे हैं कि जब भी कोई शिकायत लेकर मंत्रीजी के दरबार में पहुंचता है, तो जवाब होता है, ‘सबकी शिकायत करो, धाकड़ की नहीं।’ और फिर एक ठंडी सांस के साथ ‘धाकड़ को हटाना हमारे बस की बात नहीं है।’ नारदजी कहते हैं, जो इतना धाकड़ हो, उसे भला कौन हटा सकता है?
बड़े साहब का ‘ससुराल प्रेम’ और ‘प्रॉपर्टी पुराण’
राज्य मंत्रालय में पदस्थ एक प्रमोटी बड़े साहब इन दिनों अपने विभागीय काम से ज्यादा ‘ससुराल प्रेम’ और ‘प्रॉपर्टी’ के प्रति विशेष लगाव को लेकर चर्चा में हैं। कहानी कुछ यूं बताई जा रही है कि साहब का दिल सरकारी कुर्सी पर बैठकर भी सीधा ससुराल की दिशा में धडक़ता है। सासु मां, साली और साले के नाम पर प्रॉपर्टी खरीदने का उनका उत्साह देखते ही बनता है। सरकारी सेवा के दौरान जहां-जहां उनकी पदस्थापना रही, वहां-वहां जमीन-जायदाद में निवेश की एक अदृश्य लकीर खिंचती चली गई। कहा जाता है कि देवास, उज्जैन और इंदौर में उनका प्रशासनिक कार्यकाल जितना सक्रिय रहा, उतना ही सक्रिय उनका ‘प्रॉपर्टी पोर्टफोलियो’ भी रहा। लेकिन सर्वाधिक कृपा ग्वालियर पर बरसने की चर्चा है। वजह, वहां उनकी प्रिय ससुराल बसती है। नारदजी कहते हैं, सच क्या है यह तो जांच एजेंसियां ही जानें। फिलहाल साहब का नाम सरकारी फाइलों से कम और ‘ससुराल प्रेम’ व ‘प्रॉपर्टी पुराण’ से ज्यादा जोड़ा जा रहा है।







