मध्यप्रदेश के सिंगरौली जिले के अतरवा गांव में गुरुवार तडक़े जो हुआ, वह केवल दो हत्याओं की घटना नहीं, बल्कि समाज की गहराई में बैठे अंधविश्वास और मानसिक असंतुलन की भयावह तस्वीर है। 21 वर्षीय युवक छत्रपति सिंह ने पड़ोस में रहने वाली 50 वर्षीय फूल कुमारी सिंह और 65 वर्षीय केमला सिंह को पूजा के बहाने घर बुलाया और धारदार हथियार से उन पर हमला कर मौत के घाट उतार दिया। बीच-बचाव करने पहुंचे दो अन्य लोग भी घायल हो गए। पहली नजर में यह घटना जादू-टोने के शक से जुड़ी बताई जा रही है। आरोपी की पत्नी के गर्भ में तीन वर्ष पूर्व बच्चे की मौत हो गई थी। इस दुखद घटना का दोष उसने पड़ोसियों पर मढ़ दिया। शक, पीड़ा और अंधविश्वास का यह घातक मिश्रण अंतत: दो निर्दोष जिंदगियों के अंत का कारण बन गया। सवाल यह है कि आखिर 21वीं सदी में भी जादू-टोने का भ्रम इतना प्रबल क्यों है? विज्ञान और शिक्षा के प्रसार के बावजूद समाज के कुछ हिस्सों में अंधविश्वास की जड़ें इतनी गहरी हैं कि लोग व्यक्तिगत त्रासदी का समाधान तर्क में नहीं, बल्कि किसी पर आरोप लगाकर खोजते हैं। जब व्यक्तिगत दुख विवेक पर हावी हो जाता है, तब परिणाम अक्सर हिंसक और भयावह होते हैं। घटनास्थल से नारियल और पूजा सामग्री का मिलना इस बात की ओर इशारा करता है कि हत्या को धार्मिक अनुष्ठान का रूप देने की कोशिश की गई। यह प्रवृत्ति और भी चिंताजनक है, क्योंकि यह आस्था के नाम पर अपराध को वैध ठहराने की मानसिकता को दर्शाती है। पुलिस ने आरोपी को हिरासत में लेकर जांच शुरू कर दी है। लेकिन यह प्रवृति केवल कानूनी कार्रवाई से समाप्त होने वाली नहीं है। जरूरत है सामाजिक जागरूकता अंधविश्वास के खिलाफ ठोस अभियान की। सिंगरौली जिले की यह घटना चेतावनी है कि जब तक समाज शिक्षा, संस्कार और संवेदनशीलता को प्राथमिकता नहीं देगा, तब तक अंधविश्वास का यह बर्बर खूनी खेल रुकने वाला नहीं।







