अमेरिका की राजनीति में एक बार फिर बड़ा घमासान छिड़ गया है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद 10 प्रतिशत अतिरिक्त वैश्विक शुल्क (टैरिफ) लगाने का ऐलान कर सियासी पारा चढ़ा दिया है। अदालत ने साफ कहा कि अंतरराष्ट्रीय आपात आर्थिक शक्तियां अधिनियम (आईईईपीए) के तहत राष्ट्रपति बिना कांग्रेस की मंजूरी के आयात शुल्क नहीं लगा सकते। लेकिन ट्रंप ने व्यापार अधिनियम की धारा 122 के तहत नया आदेश लाने की बात कहकर संकेत दे दिया है कि यह मुकाबला अभी खत्म नहीं हुआ है। ट्रंप की राजनीति का केंद्र हमेशा आर्थिक राष्ट्रवाद रहा है। वे आयात शुल्क को अमेरिका की अर्थव्यवस्था की सुरक्षा ढाल मानते हैं। उनका कहना है कि विदेशी देश अमेरिका का फायदा उठाते रहे हैं, और यह कदम उसी का जवाब है। प्रेस वार्ता में उन्होंने न्यायालय के फैसले को निराशाजनक बताया और कहा कि इससे विदेशी देश खुश होंगे, लेकिन यह खुशी ज्यादा दिन नहीं टिकेगी। दूसरी ओर, सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय संवैधानिक संतुलन की याद दिलाता है। कराधान और व्यापार नीति का अधिकार विधायिका यानी कांग्रेस के पास है। अदालत ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रपति की शक्तियां असीमित नहीं हैं। यह फैसला सत्ता के विभाजन और नियंत्रण की व्यवस्था को मजबूत करने वाला माना जा रहा है। अब बड़ा सवाल यह है कि क्या धारा 122 के तहत लगाया जाने वाला नया शुल्क कानूनी जांच में टिक पाएगा? यदि इस पर भी चुनौती आती है, तो मामला फिर न्यायालय की चौखट पर पहुंच सकता है। यह विवाद केवल आयात शुल्क का नहीं, बल्कि अमेरिकी लोकतंत्र की बुनियादी संरचना का है। आने वाले महीने तय करेंगे कि इस टकराव में पलड़ा किसका भारी रहेगा-कार्यपालिका का या संविधान का।







