दुनिया में चिकित्सा विज्ञान तेजी से प्रगति कर रहा है, लेकिन इसके बावजूद महिलाओं के स्वास्थ्य से जुड़ी कई चुनौतियां गंभीर होती जा रही हैं। स्तन कैंसर आज ऐसी ही एक बड़ी वैश्विक स्वास्थ्य समस्या बन चुका है। हाल ही में प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका द लैंसेट ऑन्कोलॉजी में प्रकाशित एक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन ने इस बीमारी की भयावह तस्वीर सामने रखी है। अध्ययन के अनुसार वर्ष 2023 में दुनिया भर में लगभग 23 लाख महिलाओं में स्तन कैंसर के नए मामले सामने आए, जबकि करीब 7.64 लाख महिलाओं की मौत इस बीमारी के कारण हुई। यह आंकड़े बताते हैं कि स्तन कैंसर अब केवल एक चिकित्सा समस्या नहीं, बल्कि वैश्विक सार्वजनिक स्वास्थ्य की बड़ी चुनौती बन चुका है। अध्ययन में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी सामने आया कि अमीर देशों और गरीब देशों के बीच स्वास्थ्य सेवाओं की असमानता स्तन कैंसर से होने वाली मौतों को काफी हद तक प्रभावित करती है। उच्च आय वाले देशों में स्तन कैंसर के मामलों की पहचान ज्यादा होती है, क्योंकि वहां बेहतर स्क्रीनिंग सुविधाएं, नियमित स्वास्थ्य जांच और जागरूकता अभियान मौजूद हैं। इसके कारण वहां मामलों की संख्या अधिक होने के बावजूद मृत्यु दर में लगातार कमी देखी गई है। 1990 के बाद इन देशों में स्तन कैंसर से होने वाली मौतों में लगभग 30 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। इसके विपरीत निम्न आय वाले देशों की स्थिति चिंताजनक है। इन देशों में स्तन कैंसर के मामले अपेक्षाकृत कम दर्ज होते हैं, लेकिन मृत्यु दर तेजी से बढ़ रही है। अध्ययन के अनुसार 1990 के बाद इन देशों में स्तन कैंसर से होने वाली मौतों में लगभग 99 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। इसके पीछे मुख्य कारण समय पर जांच की कमी, सीमित चिकित्सा संसाधन और उपचार सुविधाओं का अभाव है। इस वैश्विक शोध में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), भोपाल के बायोकैमिस्ट्री विभाग के प्रोफेसर डॉ. सुखेश मुखर्जी की भागीदारी भी महत्वपूर्ण रही है। यह दर्शाता है कि भारत भी इस विषय पर वैश्विक स्तर पर शोध में सक्रिय भूमिका निभा रहा है। अध्ययन में यह भी बताया गया है कि बदलती जीवनशैली भी स्तन कैंसर के बढ़ते मामलों के लिए जिम्मेदार है। अस्वास्थ्यकर आहार, तंबाकू का उपयोग और बढ़ता रक्त शर्करा स्तर जैसे कारक इस बीमारी के खतरे को बढ़ा रहे हैं। सबसे चिंता की बात यह है कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो वर्ष 2050 तक स्तन कैंसर के मामलों की संख्या 35.6 लाख तक पहुंच सकती है और मौतों का आंकड़ा 13.7 लाख तक हो सकता है। ऐसी स्थिति में सबसे जरूरी है कि महिलाओं के बीच जागरूकता बढ़ाई जाए और नियमित जांच को बढ़ावा दिया जाए। समय पर पहचान और बेहतर उपचार सुविधाएं ही इस गंभीर बीमारी से होने वाली मौतों को कम करने का सबसे प्रभावी उपाय हैं।





