– डॉ. मयंक चतुर्वेदी
मध्यप्रदेश कांग्रेस ने आठ जुलाई को अशोकनगर में न्याय सत्याग्रह नाम से प्रदेश सरकार के विरोध में कार्यक्रम किया। प्रदेश भर से नेता और कार्यकर्ता यहां पार्टी अध्यक्ष जीतू पटवारी पर दर्ज एफआईआर के विरोध में गिरफ्तारी देने पहुंचे थे। इसी बीच ग्वालियर ग्रामीण कांग्रेस विधायक साहब सिंह गुर्जर ने मंच से कहा कि “जो मर्द थे वे जंग में आए, जो हिजड़े थे, वे संघ में गए। समझ गए न, इशारा ही काफी है।” यानी कि इनके हिसाब से जो भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में कार्य कर रहे हैं, वे सभी हीजड़े हैं। अब बुरा लगनेवालों को बुरा लग सकता है, किंतु ऐसे भी बहुतेरे हैं, जिनका मानना है कि यदि कांग्रेस में जाने से ही मर्द बनते हैं तो हमें ऐसा मर्द नहीं बनना, जिनका अपने राष्ट्र के प्रति पूर्ण समर्पण न हो। कार्यक्रम में पार्टी अध्यक्ष जीतू पटवारी समेत कांग्रेस के प्रदेश भर से कई विधायकों के साथ नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार, पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह सहित सभी बड़े कांग्रेसी नेता मौजूद थे। यानी कि जब यह बात कही जा रही थी तो किसी भी कांग्रेसी ने इसका विरोध नहीं किया, मतलब साफ है कि सभी का इस कथन को समर्थन रहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में जो हैं वे सभी हीजड़े हैं और जो मर्द हैं वे सभी कांग्रेसी हैं।
वास्तव में देखा जाए तो यह इन कांग्रेसियों की बेशर्मी की हद है। क्योंकि ये सभी रास्वसंघ के उस त्याग को नकारना चाहते हैं जिसके परिणाम स्वरूप स्वयंसेवकों ने अपने अथक प्रयत्नों से भारत को शक्ति सम्पन्न राष्ट्र बनाने की दिशा में अपना सर्वस्व समर्पण कर दिया। एक तरह से देखा जाए तो यह उस तीसरी बिरादरी का भी अपमान है, जिसके अधिकारों के लिए भारतीय संविधान अत्यधिक संवेदनशील है। क्योंकि जिस अर्थ में और जिस तरह से कांग्रेस अपने मंच से यह कह रही है, उस पर सभी को आपत्ति होनी चाहिए ।
फिर भी यदि कोई कांग्रेस की परिभाषा में ही कहें कि संघ का स्वयंसेवक बन जाने से हीजड़ा बन जाना है तो यह हीजड़ा बनना वाकई में बुरा नहीं है। क्योंकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ 100 साल का होने जा रहा है। 1925 में दशहरे के दिन डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की थी। अपने स्थापना काल से लेकर विश्व का कोई संगठन नहीं, जिसने आज तक बिना किसी ठोस आधार के सबसे अधिक आलोचना सही हो। अब तक संघ के ख़िलाफ़ लगे सभी आरोप कपोल-कल्पना और झूठे साबित होते आए हैं। फिर भी कांग्रेस जैसे तमाम संगठन एवं लोग हैं जो आरएसएस को कोसते रहते हैं और जनमानस के बीच झूठा नैरेटिव गढ़ने का काम करते हैं।
कश्मीर विलयीकरण : स्वयंसेवकों ने मातृभूमि की रक्षा करने प्राणों की आहुती दी
आज जो संघ को हीजड़ा कह रहे हैं, उन्हें भी यह समझ लेना चाहिए कि देश हित में यदि वे भी हिजड़े बन जाएं तो इससे अच्छा कुछ हो नहीं सकता, क्योंकि वे संघ के स्वयंसेवकों ही थे जिन्होंने अक्टूबर 1947 से ही कश्मीर सीमा पर पाकिस्तानी सेना की गतिविधियों पर बगैर किसी प्रशिक्षण के लगातार नज़र रखी। यह काम न नेहरू-माउंटबेटन सरकार कर रही थी, न हरिसिंह सरकार। उसी समय, जब पाकिस्तानी सेना की टुकड़ियों ने कश्मीर की सीमा लांघने की कोशिश की, तो सैनिकों के साथ कई स्वयंसेवकों ने भी अपनी मातृभूमि की रक्षा करते हुए लड़ाई में प्राण गवां दिए थे।
आज वास्तव में कांग्रेसियों को यह पता होना चाहिए कि जब कश्मीर के महाराजा हरि सिंह विलय का फ़ैसला नहीं कर पा रहे थे और उधर कबाइलियों के भेष में पाकिस्तानी सेना सीमा में घुसती जा रही थी, तब नेहरू सरकार कुछ भी नहीं कर पा रही थी, तब देश के पहले गृहमंत्री सरदार पटेल ने रास्वसंघ के दूसरे सर संघचालक गुरु गोलवलकर से मदद मांगी और गुरुजी श्रीनगर पहुंच गए, वे कश्मीर के महाराजा से मिले। इसके बाद ही महाराजा ने कश्मीर के भारत में विलय पत्र का प्रस्ताव दिल्ली भेजा। पाकिस्तान के कबायली युद्ध के दौरान कश्मीर की तुरंत हवाईपट्टी के निर्माण का कार्य संघ के स्वयंसेवकों ने कर दिखाया था, जब जाकर वायु सेना अपने हवाई जहाज उतार पाई थी।
भारत विभाजन के वक्त स्वयंसेवकों ने सेवाकार्य में अपना जीवन लगाया
विभाजन के दंगे भड़कने पर, जब नेहरू सरकार पूरी तरह हैरान-परेशान थी और उन्हें समाप्त कर पाने में विफल हो गई, तब उसने भी रास्वसंघ के स्वयंसेवकों को सरकार की मदद करने की गुहार लगाई थी। वे रास्वसंघ ने स्वयंसेवक ही थे, जिन्होंने पाकिस्तान से जान बचाकर आए शरणार्थियों के लिए 3000 से ज़्यादा राहत शिविर लगाए थे। सेना की मदद के लिए देश भर से संघ के स्वयंसेवक जिस उत्साह से सीमा पर पहुंचे, उसे पूरे देश ने देखा और सराहा था। स्वयंसेवकों ने सरकारी कार्यों में और विशेष रूप से जवानों की मदद में पूरी ताकत लगा दी थी। सैनिक आवाजाही मार्गों की चौकसी, प्रशासन की मदद, रसद और आपूर्ति में मदद, और यहां तक कि शहीदों के परिवारों की भी चिंता यह सभी कार्य संघ के स्वयंसेवक जीजान लगाकर कर रहे थे।
तब नेहरू भी विवश हो गए थे गणतंत्र परेड में स्वयंसेवकों को बुलाने
जिसके परिणाम स्वरूप स्वयं जवाहर लाल नेहरू अपने को रोक नहीं सके और तमाम विरोधी भाव रखने के बाद भी उन्हें देश सेवा के लिए स्वयंसेवकों के समर्पण के सामने झुकना पड़ा था। वर्ष 1963 की 26 जनवरी परेड में रास्वसंघ को शामिल होने का निमंत्रण उनके द्वारा दिया गया था। परेड करने वालों को आज भी महीनों तैयारी करनी होती है, लेकिन मात्र दो दिन पहले मिले निमंत्रण पर 3500 स्वयंसेवक गणवेश में उपस्थित हो गए थे। निमंत्रण दिए जाने की आलोचना होने पर नेहरू ने कहा- “यह दर्शाने के लिए कि केवल लाठी के बल पर भी सफलतापूर्वक बम और चीनी सशस्त्र बलों से लड़ा सकता है, विशेष रूप से 1963 के गणतंत्र दिवस परेड में भाग लेने के लिए आरएसएस को आकस्मिक आमंत्रित किया गया।”







