मानव शरीर केवल उतना नहीं है जितना वो दिखता है। वेदांत कहता है कि मानव शरीर एक नहीं तीन है। शरीर, मन और आत्मा। हो सकता है कि आप किसी अन्य धर्म से संबंध रखते हो और आत्मा की बात को नहीं स्वीकारते हो। बस इतना ही समझ लीजिए कि जो शक्ति शरीर और मन को समझ रही है वो आपकी आत्मा है। लेकिन यह बात केवल सोचने से या पढऩे से समझ नहीं आती। यह बात केवल केवल गहरे ध्यान में जाकर और फिर उससे बाहर आकर ही समझ आती है।
सुंदर, असुंदर कुछ भी हो हर व्यक्ति अपने शरीर से तो प्यार करता ही है। हम हर तरह से अपने शरीर का ख्याल रखते है। अपनी हैसियत के हिसाब से अपने तन पर या शरीर का अधिक से अधिक खर्च भी करते है। लेकिन हमारा मन जो शरीर को कंट्रोल करता है, उसे भूल जाते है। जैसे शरीर मैला होता है वैसे मन भी मैला होता है। मन मैला होता है नेगेटिव विचारों से। जैसे शरीर को स्नान से स्वच्छ करते है ठीक ऐसे ही मन को भी स्नान करवाना होता है। लेकिन मन का स्नान पानी से नहीं बल्कि ध्यान से होता है। लेकिन ध्यान की जब बात आती है तो बहुत सारे डर हमारे मन में पैदा होने लगते हैं कि, कही मैं योगी तो नहीं बन जाऊंगा? कही मंै जंगलों की तरफ तो नहीं चला जाऊंगा? कहीं मेरा घरबार तो नहीं छूट जाएगा? हमारे मन में शायद ऐसे प्रश्न कम उठे लेकिन हमारे घरवालों के मन में तो और भी तीव्र गति से उठने लगते है। मां सोचती है कि बेटा या बेटी कही घर हो न छोड़ दे? पत्नी सोचती है कि कही ये मुझे ही न छोड़ दे?
जब हम किसी वस्तु के बारे में ठीक से नहीं जानते हो न तो उस वस्तु को लेकर तरह तरह के डर हमारे मन में पैदा होते है। उदाहरण के तौर पर जब पहली बार रेल गाड़ी का परीक्षण हुआ तो उसमें मृत्यु प्राप्त कैदियों को यात्रा के लिए बिठाया गया था। क्योंकि बिल्कुल नया एक्सपेरिमेंट था। डर यह था कि गाड़ी जब तेज स्पीड से चलेगी तो इसमें बैठे सभी लोग मर जाएंगे। पता जो नहीं था। इसी डर से ही मृत्यु दंड प्राप्त कैदियों को बिठा दिया। यानी डर हमें वो नहीं करने देता जो हम करना चाहते हैं। ध्यान भी हमारे लिए एक बिल्कुल नया अनुभव है इसलिए डर पैदा होना स्वाभाविक है। इसलिए हमें ध्यान को करने से पहले ध्यान को जानना होगा। ध्यान वो प्रक्रिया है जो हमारे मन को स्नान करवा अतिशुद्ध बना देती है। जैसे एक स्वस्थ शरीर के लिए नियमित स्नान जरूरी है वैसे ही एक स्वस्थ मन के लिए नियमित ध्यान जरूरी है। ध्यान से मन स्वच्छ होता है और बुद्धि प्रखर। अब भला प्रखर बुद्धि वाला व्यक्ति क्यों घर छोड़ेगा।







