नई दिल्ली। इस बार 26 जनवरी को भारतीय सेना के कुछ जांबाज ‘मूक योद्धा’ जैसे- बैक्ट्रियन ऊंट, शिकारी पक्षी, जांस्कारी घोड़े और सैन्य कुत्ते राष्ट्रीय राजधानी के कर्तव्य पथ पर आयोजित गणतंत्र दिवस परेड समारोह में समर्पण और निस्वार्थ भाव से देश की शौर्य एवं साहस गाथा से हर खासो-आम का तारुफ़ (परिचय) कराते हुए नजर आएंगे।
सैन्य अधिकारियों ने बताया कि यह पहली बार होगा जब उसका पशु दस्ता इतने बड़े पैमाने पर संगठित रूप से परेड का हिस्सा बनेगा। करीब 26 पशु-पक्षी इसमें शामिल होंगे। इनमें 2 बैक्ट्रियन ऊंट, 4 ज़ांस्कार पोनी (घोड़े), 4 शिकारी पक्षी (रैप्टर्स), भारतीय नस्ल के 10 कुत्ते और बल में पहले से काम कर रहे 6 पारंपरिक सैन्य कुत्ते मुख्य हैं। सैन्य दस्ते की अगुवाई बैक्ट्रियन ऊंट करेंगे। जिन्हें हाल ही में लद्दाख के ठंडे रेगिस्तानी इलाकों में तैनात किया गया है। यह ऊंट अत्यधिक ठंडे मौसम के साथ ही 15 हजार फीट की ऊंचाई पर आसानी से अपना काम कर सकते हैं। ऊंटों की एक खास बात ये भी है कि यह कुल 250 किलोग्राम तक का सामान अपनी पीठ पर लादकर चल सकते हैं। इतना ही नहीं कम पानी और चारे के साथ भी यह लंबी दूरी तय कर सकते हैं। जिससे सेना को दूरदराज के कठिन सीमाई इलाकों में जरूरी रसद पहुंचाने में मदद मिलती है। परेड में शामिल चार शिकारी पक्षी (रैप्टर्स) सेना की नई और स्मार्ट सोच को प्रदर्शित करते हैं। इनका इस्तेमाल फोर्स द्वारा निगरानी और हवाई सुरक्षा से जुड़े हुए कामों के लिए किया जाता है। दस्ते में शामिल ज़ांस्कार पोनी घोड़े लद्दाख की एक दुर्लभ और स्वदेशी नस्ल है। आकार में तो ये घोड़े छोटे हैं। बावजूद इसके इनमें जबरदस्त ताकत और सहनशक्ति होती है। माइनस 40 डिग्री तापमान और समुद्रतल से अत्यधिक ऊंचाई वाले इलाकों में ये 40 से 60 किलोग्राम तक वजन लेकर चल सकते हैं। वर्ष 2020 से यह सियाचिन जैसे कठिन क्षेत्रों में सैनिकों के साथ सेवा दे रहे हैं, जिसमें कई बार यह एक दिन में 70 किलोमीटर तक गश्त करते हैं।
आतंकवाद रोधी अभियानों में मददगार कुत्ते
सैन्य अधिकारियों ने बताया कि परेड में शामिल भारतीय सेना के कुत्तों को मेरठ में रिमाउंट और वेटरनरी कॉर्प्स केंद्र में प्रशिक्षित किया गया है। यह आतंकवाद रोधी अभियानों से लेकर विस्फोटक, बारूदी सुरंगों की पहचान, खोज-बचाव कार्यों और आपदा राहत में सैनिकों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करते हैं। कई मौकों पर इन कुत्तों ने अपनी जान की परवाह किए बिना सैनिकों की जान बचाई है। आत्मनिर्भर भारत के तहत सेना अब मुधोल हाउंड, रामपुर हाउंड, चिप्पीपराई, कोम्बई और राजापलायम जैसी भारतीय नस्लों के कुत्तों को भी बड़े बड़े पैमाने पर शामिल कर रही है। जो देश की अपनी क्षमताओं पर बढ़ते विश्वास का स्पष्ट प्रतीक हैं। सेना कहती है कि यह मूक योद्धा उसके केवल सच्चे साथी नहीं बल्कि चार पैरों पर चलने वाले सच्चे वीर योद्धा हैं।







