भोपाल। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत के वक्तव्य ने एक बार फिर समाज के मूल प्रश्नों को केंद्र में ला खड़ा किया है। ‘लव जिहाद’ जैसे संवेदनशील विषय पर उन्होंने जिस स्पष्टता से कहा कि रोकथाम की शुरुआत परिवार से होनी चाहिए, वह केवल एक सामाजिक टिप्पणी नहीं, बल्कि आत्ममंथन का आह्वान है। सवाल यह नहीं कि अपराध बाहर कैसे पनपते हैं, सवाल यह भी है कि भीतर-परिवार और समाज में कौन-सी चूकें रास्ता बना देती हैं।
भागवत का यह कहना कि यह समझने की जरूरत है कि ‘बेटी बहकावे में कैसे आ जाती है’, एकतरफा दोषारोपण नहीं, बल्कि संवाद की कमी की ओर संकेत है। आज के दौर में जहां तकनीक ने दुनिया को नजदीक ला दिया है, वहीं परिवारों के भीतर संवाद की दूरी बढ़ी है। माता-पिता और बच्चों के बीच भरोसे और बातचीत का अभाव कई बार गलत फैसलों की जमीन तैयार करता है। ऐसे में चेतावनी, पाबंदी या भय नहीं, बल्कि सतत संवाद और समझदारी ही सबसे मजबूत सुरक्षा कवच हो सकता है।
भोपाल में आयोजित ‘स्त्री शक्ति संवाद’ में भागवत का यह कथन भी महत्वपूर्ण है कि स्त्री और पुरुष की श्रेष्ठता की तुलना व्यर्थ है। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। यह विचार आज के प्रतिस्पर्धी और टकरावपूर्ण विमर्श के बीच संतुलन की बात करता है। समानता का अर्थ प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि सहयोग है। समाज तब स्वस्थ रहता है जब दोनों अपनी-अपनी भूमिका में सम्मान और स्वायत्तता के साथ आगे बढ़ते हैं। संघ प्रमुख ने महिलाओं को समाज की शिल्पकार बताते हुए मां की भूमिका को केंद्रीय बताया। यह सच है कि संस्कारों की पहली पाठशाला घर ही होता है और उसमें मां की भूमिका निर्णायक होती है। लेकिन यह जिम्मेदारी केवल महिलाओं पर डाल देना भी उचित नहीं होगा। परिवार का हर सदस्य पिता, भाई, बुजुर्ग सभी मिलकर ही ऐसा वातावरण बना सकते हैं जहां बेटियां सुरक्षित, आत्मविश्वासी और जागरूक बन सकें।
पश्चिमीकरण की अंधी नकल पर भागवत की टिप्पणी भी विचारणीय है। आधुनिकता और परंपरा के बीच संतुलन साधना आज की सबसे बड़ी चुनौती है। आधुनिक बनना गलत नहीं, लेकिन अपनी सांस्कृतिक जड़ों से कटकर अपनाई गई जीवनशैली कई बार मूल्यहीनता और मानसिक तनाव को जन्म देती है। रानी लक्ष्मीबाई का उदाहरण यह याद दिलाता है कि भारतीय नारी ने परंपरा और शक्ति दोनों को साथ लेकर इतिहास रचा है। मानसिक तनाव, अकेलापन और आत्महत्या पर चिंता जताकर भागवत ने एक और गंभीर सामाजिक संकट की ओर ध्यान खींचा। असंभव अपेक्षाएं, संवादहीनता और केवल सफलता-केंद्रित सोच बच्चों और युवाओं को भीतर से तोड़ रही है। जीवन की सार्थकता केवल उपलब्धियों में नहीं, बल्कि संतुलन, संबंध और उद्देश्य में है। अंतत: भागवत का यह कथन कि मातृशक्ति के बिना राष्ट्र निर्माण अधूरा है, एक व्यापक संदेश देता है। नारी सम्मान केवल भाषणों या श्लोकों तक सीमित न रहे, बल्कि सुरक्षा, अवसर और भागीदारी में दिखे, यही ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते’ का आधुनिक अर्थ है। परिवार से शुरू होकर समाज और राष्ट्र तक, यदि संवाद, सम्मान और जिम्मेदारी का यह सूत्र अपनाया जाए, तभी सशक्त नारी और सुरक्षित समाज का सपना साकार हो सकता है।







