जबलपुर में नालों के गंदे पानी से सब्जी उगाने का मामला अब सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि एक बड़े सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट का संकेत बन चुका है। मप्र हाईकोर्ट में जनहित याचिका पर हुई ताजा सुनवाई और प्रदूषण नियंत्रण मंडल की रिपोर्ट ने यह साफ कर दिया है कि शहर की हरियाली के पीछे जहर बह रहा है और वही जहर दबे पांव लोगों की थाली तक पहुंच रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, जबलपुर के लगभग सभी प्रमुख नालों में सीवेज की भारी मिलावट है। पानी में बीओडी, टोटल कॉलीफॉर्म और फीकल कॉलीफॉर्म जैसे घातक तत्व तय मानकों से कहीं अधिक पाए गए हैं। सरल शब्दों में कहें तो यह पानी न पीने लायक है, न नहाने लायक और न ही खेती के लिए उपयुक्त। इसके बावजूद इसी पानी से सब्जियों की सिंचाई होना प्रशासनिक उदासीनता की पराकाष्ठा है।
हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच की सख्त टिप्पणी बताती है कि अब हालात ‘चलता है’ वाले नहीं रहे। अदालत ने सरकार को प्रदूषण नियंत्रण मंडल के सुझावों पर तत्काल अमल करने और नालों के पानी के किसी भी उपयोग पर रोक लगाने के निर्देश दिए हैं। साथ ही घरों से निकलने वाले सीवेज को सीधे नालों में जाने से रोकने की बात कही है। यह निर्देश दरअसल सिस्टम के लिए चेतावनी हैं-अब बहाने नहीं, कार्रवाई चाहिए। आंकड़े स्थिति की गंभीरता को और उजागर करते हैं। जबलपुर में प्रतिदिन 174 मिलियन लीटर सीवेज उत्पन्न होता है, लेकिन उपचार हो पा रहा है केवल 75.14 मिलियन लीटर का। शेष लगभग 98.86 मिलियन लीटर दूषित पानी सीधे या परोक्ष रूप से नालों के घरों में पहुंच रहा है। शहर में मौजूद 12 सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट भी पूरी क्षमता से काम नहीं कर पा रहे हैं। यह तकनीकी विफलता से अधिक प्रशासनिक इच्छाशक्ति की कमी को दर्शाता है।
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल द्वारा नगर निगम पर लगाया गया 17.80 करोड़ रुपये का पर्यावरणीय दंड अब तक जमा न होना भी सिस्टम की ढिलाई का प्रतीक है। सवाल यह है कि जब दंड और अदालतें भी असर नहीं डाल पा रहीं, तो आम नागरिक की सेहत की सुरक्षा कौन करेगा? जबलपुर का यह मामला एक चेतावनी है। अगर नालों में बहते जहर को आज नहीं रोका गया, तो कल इसी जबलपुर शहर में इंदौर की तरह कोई नया भागीरथपुरा सामने आएगा। शहर की सेहत बचानी है, तो सफाई सिर्फ कागजों में नहीं, जमीन पर दिखनी चाहिए।







