महेश दीक्षित
धार की भोजशाला इस बार किसी कानूनी विवाद या सियासी बयानबाजी के कारण नहीं, बल्कि एक ऐसे दृश्य के कारण चर्चा में है, जो उम्मीद जगाता है और भरोसा लौटाता है। बसंत पंचमी के दिन एक ही परिसर में शंखनाद की ध्वनि भी उठेगी और अजान की दुआ भी। हिंदू समाज सरस्वती की आराधना करेगा, तो मुस्लिम समुदाय नमाज अदा करेगा। वर्षों से विवादों के साये में रही भोजशाला में यह क्षण मानो धर्म के नए, उजले अर्थ की घोषणा है।
अब तक भोजशाला को टकराव की प्रतीक भूमि के रूप में देखा जाता रहा है-कभी मंदिर, कभी मस्जिद के दावों में उलझी पहचान। लेकिन बसंत पंचमी 2026 की तस्वीर यह बताती है कि आस्था केवल अधिकार का आग्रह नहीं, बल्कि संयम, मर्यादा और परस्पर स्वीकार्यता की मांग भी करती है। जब पूजा और नमाज एक-दूसरे की उपस्थिति को स्वीकार करती हैं, तब धर्म अपने सबसे मानवीय रूप में सामने आता है।
बसंत पंचमी ज्ञान, विवेक और सृजन का पर्व है। सरस्वती की आराधना सोच की शुद्धता और संतुलन का प्रतीक है, वहीं नमाज आत्मसंयम, अनुशासन और ईश्वर के प्रति विनम्र समर्पण का संदेश देती है। दोनों आस्थाओं की जड़ में शांति है, वर्चस्व और अहंकार नहीं। धार्मिक प्रतीकों और परंपराओं में भिन्नता के बावजूद, हिंदू और मुस्लिम समाज को जोडऩे वाली कड़ी वही साझा मानवता है, जो भोजशाला में एक साथ पूजा और नमाज का आधार बन रही है।
यह पहल प्रशासनिक संतुलन और संवैधानिक समझदारी की भी मिसाल है। कानून की मर्यादा में रहते हुए सभी आस्थाओं को सम्मान देना आसान नहीं, लेकिन यही लोकतंत्र की सच्ची परीक्षा है। जब व्यवस्था निष्पक्ष दिखाई देती है, तो समाज भी संयम और भरोसे का रास्ता चुनता है। ऐसे दौर में, जब धर्म को अक्सर राजनीति का औजार बना दिया जाता है, भोजशाला का यह दृश्य ताजी हवा के झोंके जैसा है। असल सवाल यह नहीं कि पूजा पहले होगी या नमाज बाद में। असल सवाल यह है कि क्या हम एक-दूसरे की आस्था को केवल सहन नहीं, बल्कि सम्मान भी कर सकते हैं। भोजशाला में बसंत पंचमी का यह प्रयोग इसी प्रश्न का रचनात्मक और सकारात्मक उत्तर है। जब एक ही आंगन में प्रार्थनाओं के दीप जलेंगे और दुआओं के हाथ उठेंगे, तब शायद इतिहास भी नई करवट ले। भोजशाला का यह बसंत याद दिलाता है कि धर्म का सबसे उजला रंग वही है, जो इंसानियत के कैनवास पर उभरता है।







