मध्यप्रदेश में दवा सुरक्षा व्यवस्था का एक ऐसा सच सामने है, जो सिहरन पैदा करता है। जिस राज्य में करोड़ों लोग इलाज के लिए इंजेक्शन, वैक्सीन और जीवनरक्षक दवाओं पर निर्भर हैं, वहां पिछले करीब 15 वर्षों से इंजेक्टेबल दवाओं की वैज्ञानिक जांच ही ठप पड़ी है। यानी जो दवा सीधे खून में जा रही है, उसकी शुद्धता पर राज्य स्तर पर कोई ठोस निगरानी नहीं हो रही। छिंदवाड़ा में जहरीले कफ सिरप से मासूमों की मौत के बाद सिरप की जांच हुई, दवा बैन हुई, यह व्यवस्था के काम करने का उदाहरण है। लेकिन सवाल यह है कि अगर ऐसी ही गड़बड़ी किसी इंजेक्शन या वैक्सीन में हो जाए तो? जवाब डराने वाला है प्रदेश में इसकी जांच की सुविधा ही उपलब्ध नहीं है।
भोपाल, इंदौर और जबलपुर की तीन ड्रग लैब्स सालभर में कुल मिलाकर करीब 6,000 सैंपल जांच पाती हैं, वो भी सामान्य दवाओं के। इंजेक्टेबल दवाओं की जांच अलग स्तर की होती है। स्टरलिटी टेस्ट, बैक्टीरियल या फंगल संक्रमण, पायरोजेन जैसे तत्वों की जांच, जो यह बताते हैं कि दवा शरीर में बुखार, इंफेक्शन या सेप्सिस जैसी घातक प्रतिक्रिया तो नहीं करेगी। ये सभी परीक्षण की व्यवस्था मप्र में उपलब्ध ही नहीं है। स्थिति इतनी खराब है कि पहले जो पायरोजेन टेस्ट खरगोशों पर होते थे, वे भी 15 साल पहले बंद हो गए। कारण लैब में मौजूद खरगोश मर गए, नए मंगाने की जरूरत ही नहीं समझी गई। नतीजा टेस्टिंग बंद और जिम्मेदारी खत्म।
अब यदि किसी इंजेक्शन की जांच करनी भी हो तो सैंपल को कोलकाता की सेंट्रल लैब भेजना पड़ता है। रिपोर्ट आने में दो-तीन महीने लग जाते हैं। तब तक वही दवा बाजार में बिकती रहती है, मरीजों को लगती रहती है। यानी शक की सुई उठे तो भी कार्रवाई कागजों में फंसी रहती है और मरीज की जान जोखिम में। देश के कई राज्य अपनी उन्नत लैब्स से इंजेक्टेबल दवाओं की रेंडम जांच कर रहे हैं। लेकिन मप्र में यह बुनियादी सुरक्षा कवच ही गायब है। स्वास्थ्य सेवाओं में ढांचा सिर्फ इमारतों से नहीं बनता, बल्कि भरोसे से बनता है। और जब इंजेक्शन की सुई के साथ सिस्टम की लापरवाही भी नसों में उतरने लगे, तो यह सिर्फ प्रशासनिक कमी नहीं, बल्कि मानव स्वास्थ्य के साथ गंभीर खिलवाड़ है।







