आगामी फिल्म ‘घूसखोर पंडत’ का नाम अब महज एक फिल्मी शीर्षक नहीं, बल्कि राष्ट्रीय बहस और विवाद का विषय बन चुका है। फिल्म का टीजर सामने आते ही देश के कई हिस्सों में विरोध तेज हो गया है। विशेष रूप से ब्राह्मण समाज के अनेक संगठनों ने इसे अपनी गरिमा पर सीधा आघात बताया है। उनका तर्क है कि ‘पंडित’ शब्द केवल एक पात्र नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान से जुड़ा सम्मानसूचक संबोधन है। ऐसे में उसे ‘घूसखोर’ जैसे शब्द के साथ जोडऩा पूरे श्रेष्ठी वर्ग को नकारात्मक रूप में पेश करता है। यहीं से विवाद भावनात्मक स्तर से आगे बढक़र सामाजिक अस्मिता का रूप लेने लगा। प्रदर्शन, शिकायतें और कानूनी धाराओं के तहत दर्ज मामले इस बात का संकेत हैं कि असंतोष सतही नहीं है। समाज के एक वर्ग में यह भावना गहराती दिख रही है कि मनोरंजन उद्योग कभी-कभी सनसनी और मुनाफे के लिए संवेदनशील पहचानों को भी विवाद का औजार बना देता है।
सवाल उठ रहा है कि, क्या किसी समुदाय की संभावित अवमानना भी ‘रचनात्मक आजादी’ के नाम पर स्वीकार कर ली जानी चाहिए? दूसरी ओर, रचनात्मक दुनिया का तर्क अलग है। फिल्मों में चरित्र होते हैं, प्रतीक होते हैं, और व्यंग्य भी होता है। हर ‘पंडित’ शब्द जाति का प्रतिनिधि नहीं, कभी-कभी वह सिर्फ कहानी का पात्र भी हो सकता है। लेकिन यहीं पर संवेदनशीलता की कसौटी शुरू होती है। कला का अधिकार जितना बड़ा है, सामाजिक जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी है। ‘घूसखोर पंडत’ विवाद कानूनी मोड़ भी ले चुका है। फिल्म मेकर्स कॉम्बाइन (एफएमसी) के पत्रों से यह सामने आया कि शीर्षक किसी एसोसिएशन में पंजीकृत नहीं था। यानी विवाद सिर्फ भावनात्मक नहीं, प्रक्रियात्मक भी है। अब सबकी निगाह निर्माता और प्लेटफॉर्म की प्रतिक्रिया पर है, जो अब तक सामने नहीं आई।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक अहम सवाल फिर जिंदा कर दिया है कि, क्या लोकप्रियता और कमाई की दौड़ में फिल्मकार कभी-कभी सामाजिक संतुलन की रेखा पार कर जाते हैं? और क्या विरोध की हर लहर कला को रोकने का माध्यम बन जानी चाहिए? स्पष्ट है, समाधान टकराव में नहीं, संवाद में है। जब तक फिल्म सामने न आए, नीयत पर अंतिम फैसला देना जल्दबाजी होगी। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि शब्दों की शक्ति अपार होती है, वे मनोरंजन भी कर सकते हैं और किसी को आहत भी।







