अस्पताल वह जगह है जहां इंसान अपनी सबसे बड़ी चिंता, सबसे बड़ा डर और सबसे गहरी उम्मीद लेकर पहुंचता है। लेकिन सोचिए, अगर वहीं उम्मीद का सौदा होने लगे तो? भोपाल के हमीदिया अस्पताल से जुड़ा हालिया मामला सिर्फ एक आपराधिक घटना नहीं, बल्कि भरोसे की रीढ़ पर लगा गहरा आघात है। डिजिटल अरेस्ट, फिशिंग, ओटीपी फ्रॉड, ये शब्द अब आम हो चुके हैं। लेकिन इस बार ठगी ने अस्पताल के बिस्तर तक पहुंचकर इंसानियत की आखिरी सीमा लांघ दी। भर्ती मरीजों के परिजनों को फोन कर खुद को डॉक्टर बताना, बेहतर इलाज का लालच देना और फिर क्यूआर कोड भेजकर पैसे ऐंठ लेना, यह सिर्फ धोखाधड़ी नहीं, बल्कि पीड़ा का घिनौना व्यापार है।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इस खेल में बाहरी ठग अकेला नहीं था। जांच में सामने आया कि अस्पताल का कुछ स्टाफ ही मरीजों की संवेदनशील जानकारी, वार्ड नंबर, बीमारी का विवरण, मोबाइल नंबर, हालत पैसों के बदले लीक कर रहा था। 20 प्रतिशत कमीशन पर बिकी यह जानकारी बताती है कि लालच ने पेशे की नैतिकता को किस हद तक निगल लिया है। स्वास्थ्य व्यवस्था भरोसे पर चलती है। मरीज डॉक्टर को भगवान मान लेता है, और अस्पताल को सुरक्षित जगह। ऐसे में जब कोई ठग डॉक्टर बनकर अस्पताल के भीतर घूमे और स्टाफ उसे सूचना सप्लाई करे, तो यह सिर्फ कानून-व्यवस्था का मामला नहीं रह जाता, यह सिस्टम की नैतिक विफलता बन जाता है।
घटना का दूसरा गंभीर पहलू यह है कि जनवरी से अब तक 10 से अधिक लोग शिकार हुए, लेकिन केवल तीन ने शिकायत की। यानी ठगी से बड़ा डर है बदनामी का, या फिर यह सोच कि ‘अब जो गया सो गया।’ यही चुप्पी ठगों की सबसे बड़ी ताकत बनती है। अस्पताल प्रबंधन ने सख्त कार्रवाई की बात कही है, पुलिस जांच कर रही है, आरोपी गिरफ्तार हो चुका है। लेकिन असली इलाज सिर्फ गिरफ्तारी नहीं, बल्कि सिस्टम की सफाई है। मरीजों की जानकारी तक किसकी पहुंच है, डेटा सुरक्षा कैसे हो, स्टाफ की जवाबदेही कैसे तय हो, यह अब टाला नहीं जा सकता।बीमारी से लड़ता इंसान पहले ही कमजोर होता है। अगर इलाज की जगह ही जाल बिछा हो, तो समाज को खुद अपना इलाज करना पड़ेगा।







