नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने लद्दाख के पर्यावरणविद् सोनम वांगचुक की हिरासत को लेकर केंद्र सरकार से तीखे सवाल पूछे। कोर्ट ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि सरकार वांगचुक के बयानों का बहुत ज्यादा मतलब निकाल रही है। यह टिप्पणी न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति पीबी वराले की पीठ ने वांगचुक की पत्नी गीतांजलि अंगमो द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान की। केंद्र सरकार की ओर से पेश वकील ने तर्क दिया कि वांगचुक ने चेतावनी दी थी कि लद्दाख में नेपाल जैसी हिंसक अशांति हो सकती है और युवा अब शांतिपूर्ण तरीकों की प्रभावशीलता पर संदेह कर रहे हैं। बता दें सोनम वांगचुक को पिछले साल सितंबर में लेह में हुई हिंसा के बाद हिरासत में लिया गया था। यह हिंसा लद्दाख को राज्य का दर्जा और संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने की मांग को लेकर हो रहे विरोध प्रदर्शनों के दौरान भडक़ी थी। वांगचुक की पत्नी ने अपनी याचिका में हिरासत को अवैध और लोकतांत्रिक असंतोष को दबाने वाला बताया है।
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने वांगचुक के भाषण का संदर्भ देते हुए कहा कि वांगचुक इसके बजाय शांतिपूर्ण तरीके छोडऩे की प्रवृत्ति पर चिंता व्यक्त कर रहे थे। पीठ ने कहा कि वह चिंतित हैं। हमें पूरा वाक्य देखना होगा। कुछ लोग गांधीवादी शांतिपूर्ण तरीके छोड़ रहे हैं। यह चिंताजनक है…ध्यान अहिंसक तरीके से भटकाव पर है, यह चिंताजनक है। केंद्र के वकील ने दावा किया कि वांगचुक ने अपने भाषण में हाइब्रिड अभिव्यक्ति का इस्तेमाल किया था। इस पर कोर्ट ने कहा केंद्र सरकार उनके बयानों की गलत व्याख्या कर रही है।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया कि केंद्र और लेह प्रशासन ने वांगचुक को स्वास्थ्य आधार पर रिहा करने के खिलाफ फैसला किया है। उन्होंने कहा कि वह फिट, स्वस्थ और तंदुरुस्त हैं। मेहता ने कहा कि उन्हें पाचन संबंधी कुछ समस्याएं थीं, जिसका इलाज चल रहा है। चिंता की बात नहीं है। उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य के आधार पर उन्हें रिहा करना उचित नहीं होगा। कोर्ट ने पिछले हफ्ते वांगचुक के स्वास्थ्य को देखते हुए हिरासत पर पुनर्विचार करने का आग्रह किया था।







