मालवा के एक प्रभावशाली नेता और मोहन सरकार के वरिष्ठ मंत्री इन दिनों अपने बयानों और नाराजगी के कारण चर्चाओं में हैं। लेकिन हाल ही में उनकी समिधा यात्रा ने राजनीतिक हलकों में नई जिज्ञासा पैदा कर दी है। सवाल यह है कि मंत्रीजी समिधा आखिर क्यों गए थे और पूरे दो घंटे तक बंद कमरे में क्या चर्चा होती रही? सियासी चर्चाओं के मुताबिक, इस मुलाकात के दौरान मंत्रीजी ने संघ के क्षेत्रीय पदाधिकारी को एक ‘गोपनीय फाइल’ सौंपी। दावा किया जा रहा है कि इस ‘फाइल’ में ऐसी जानकारियां थीं, जिनके सार्वजनिक होने पर संगठन और पार्टी, दोनों को असहज स्थिति का सामना करना पड़ सकता था। संयोग देखिये कि मंत्रीजी की इस मुलाकात के अगले ही दिन संगठन के एक बेहद प्रभावशाली ‘भाईसाब’ को पार्टी से सम्मानपूर्वक किनारे कर दिया गया। अब राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि क्या ये घटना महज इत्तेफाक है, या किसी बड़े सियासी समीकरण का हिस्सा? सच क्या है, यह तो मंत्रीजी ही बता सकते हैं, लेकिन इतना तय है कि समिधा की इस मुलाकात ने सत्ता के गलियारों में हलचल जरूर बढ़ा दी है।
भाजपा में ‘चैनल ब्रिगेड’ का बढ़ता दबदबा
मप्र भाजपा में इन दिनों एक न्यूज ‘चैनल ब्रिगेड’ का दबदबा तेजी से बढ़ता जा रहा है। चैनल के चेहरे सियासी गलियारों में भाजपा के रंग में रंगे नजर आ रहे हैं। चर्चा है कि इस चैनल के चार लोग पत्रकारिता छोडक़र एक-एक कर भाजपा से जुड़ चुके हैं। ये लोग औपचारिक रूप से पार्टी के सक्रिय सदस्य नहीं हैं, लेकिन पार्टी के लिए काम कर रहे हैं, वो भी सवैतनिक। अब चैनल की नौकरी से राजनीति में सीधी एंट्री महज संयोग है, करियर का बदलाव है या किसी सुनियोजित रणनीति का हिस्सा, यह तो संबंधित चैनल वाले ही बेहतर बता सकते हैं। फिलहाल पार्टी के भीतर यह तथाकथित ‘चैनल ब्रिगेड’ चर्चा का विषय बनी हुई है।
नेताजी के नाम पर छह सरकारी आवास!
मप्र कांग्रेस के एक कद्दावर आदिवासी नेता, जो कभी पार्टी में जबरदस्त रसूख रखते थे और लंबे समय तक केंद्र में मंत्री भी रह चुके हैं, सरकारी आवासों के मामले में किसी महाराजा से कम नहीं। राजधानी में उनके नाम पर एक नहीं, दो नहीं, बल्कि आधा दर्जन से ज्यादा सरकारी मकान आवंटित होने की चर्चाएं सियासी गलियारों में हैं। एक तो उनका आधिकारिक बंगला है ही, बाकी अलग-अलग आदिवासी संस्थाओं और समितियों के नाम पर बताए जाते हैं। इनमें से तीन आवास तो नेताजी बतौर ‘गेस्ट हाउस’ की तरह उपयोग करते हैं। बाकी आवासों के ताले साल में गिनती के दिनों में ही खुलते हैं, जब कोई खास आयोजन-प्रयोजन होता है। नारदजी कहते हैं कि पिछले दो दशकों से प्रदेश में कांग्रेस की सरकार नहीं है, फिर भी बिना सत्ता के नेताजी का इतना राजनीतिक रसूख और सत्कार कैसे बरकरार है, यह बड़ा सवाल है।
भाऊ आगे-आगे, जांच एजेंसियां पीछे-पीछे!
राजधानी के उपनगर निवासी एक तिकड़मी भाऊ के सितारे इन दिनों गर्दिश में चल रहे हैं। भाऊ व्यापारी भी हैं, शासकीय सेवक भी और विवादों से तो मानो उसका जन्मजात रिश्ता है। हालत यह है कि भाऊ कदम बढ़ाता है, और जांच एजेंसियां उसके पीछे-पीछे चल पड़ती हैं। ताजा मामला यह है कि अब उसके ही विभाग ने जालसाजी के एक मामले में जांच के आदेश दिए हैं। खास बात यह है कि यह कोई पहला झमेला नहीं है। भाऊ पहले से ही कई जांचों की आंच में तप रहा है। नारदजी की मानें तो यह वही चर्चित शख्स है जिसके ठिकानों पर कुछ महीनों पहले जांच एजेंसी ने छापेमारी की थी। कार्रवाई में भाऊ के पास से कई किलो सोना-चांदी और भारी मात्रा में नगदी बरामद हुई थी। अब देखना यह है कि नये जालसाजी प्रकरण में भाऊ का क्या होता है ?
ससुर हाशिये पर, तो साहब भी लूप लाइन में
प्रदेश के एक कद्दावर नेता और पूर्व मंत्री की चुनावी हार ने सिर्फ उनकी कुर्सी ही नहीं छीनी, बल्कि उनके दामाद की ‘सरकारी चमक’ भी फीकी कर दी। जब तक नेताजी सत्ता में थे, तब तक साहब मलाईदार पदों पर तैनात रहते थे। ऐसे पद, जिन पर बैठकर फाइलें कम और रसूख ज्यादा चलता है। लेकिन जैसे ही चुनावी नतीजों ने नेताजी को मंत्री से पूर्व मंत्री बना दिया, राजनीतिक हवाओं का रुख बदल गया। सत्ता के गलियारों में समीकरण बदले तो साहब की पोस्टिंग का नक्शा भी बदल गया। अब हाल यह हैं कि अपने ही विभाग के वरिष्ठ मंत्री की नाराजगी के चलते उन्हें ऐसे विभाग में भेज दिया गया है, जिसे अफसरशाही की भाषा में ‘लूप लाइन’ कहा जाता है। नारदजी कहते हैं कि जब ससुर ही राजनीति के हाशिये पर पहुंच जाएं, तो दामाद को मुख्यधारा में टिकाए रखने की ताकत भला किसमें है।







