मप्र और राजस्थान की संयुक्त पुलिस कार्रवाई ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि नशे का कारोबार अब गली-मोहल्लों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि संगठित नेटवर्क के रूप में राज्यों की सीमाओं को लांघ चुका है। रतलाम से जुड़े एक कथित राजनीतिक करीबी के नाम उछलने के बाद शुरू हुई यह कड़ी अब आगर मालवा से झालावाड़ तक जा पहुंची है। पुलिस के अनुसार करोड़ों रुपये के नशीले पदार्थों की बरामदगी केवल एक छापा नहीं, बल्कि उस गहरे जाल की झलक है जो युवाओं की नसों में जहर घोल रहा है।
सुसनेर के पास पकड़े गए एक ड्रग पैडलर से मिली जानकारी ने पुलिस को जिस ‘घर में चल रही फैक्ट्री’ तक पहुँचाया, वह तस्वीर बेहद चिंताजनक है। बाहर से बंद साधारण मकान और अंदर कथित रूप से स्मैक, एमडी, केटामाइन जैसे खतरनाक ड्रग्स का जखीरा यह बताता है कि अवैध नशा कारोबार कितनी चुपचाप हमारी बस्तियों के बीच घुसपैठ बना रहा है। मशीनें, केमिकल और कथित निर्माण व्यवस्था इस बात की ओर इशारा करती हैं कि यह केवल सप्लाई पाइंट नहीं, बल्कि उत्पादन केंद्र था। यह भी गंभीर तथ्य है कि इस पूरे ऑपरेशन में कई जिलों की पुलिस और करीब 80 जवानों को लगाना पड़ा। इसका सीधा अर्थ है नेटवर्क बड़ा है, संसाधन मजबूत हैं और सप्लाई चेन दूर तक फैली हुई है। पुलिस अब रिमांड लेकर पूछताछ की बात कर रही है, जिससे आगे और खुलासे संभव हैं। असली परीक्षा यहीं से शुरू होती है। क्या यह कार्रवाई सिर्फ गिरफ्तारी तक सीमित रहेगी या पूरे नेटवर्क की जड़ तक पहुंचेगी?
सवाल सिर्फ कानून-व्यवस्था का नहीं, सामाजिक सुरक्षा का भी है। करोड़ों का नशा आखिर किसके लिए तैयार हो रहा था? जवाब साफ है हमारे शहरों, कस्बों और गांवों के युवाओं के लिए। जब रिहायशी इलाकों में कथित ड्रग फैक्ट्री चलने लगे, तो यह केवल अपराध नहीं, समाज के भविष्य पर हमला है। अब जरूरत है सख्त, निरंतर और राजनीतिक प्रभाव से मुक्त कार्रवाई की। क्योंकि नशे का यह कारोबार जितना छिपा हुआ है, उतना ही घातक भी।







