बस्तर लंबे समय तक चुनौतियों, संघर्ष और उपेक्षा का पर्याय रहा है। नक्सल हिंसा, दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियां और बुनियादी सुविधाओं की कमी ने इस अंचल की अपार संभावनाओं को वर्षों तक जकड़े रखा। लेकिन अब तस्वीर बदलने के संकेत साफ दिखाई दे रहे हैं। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की अगुवाई में बस्तर के समग्र विकास के लिए प्रस्तावित तीन साल का एक्शन प्लान इसी बदलाव की बुनियाद रखने की कोशिश है।
बस्तर की समस्याएं स्पष्ट हैं-दूरस्थ गांवों तक सडक़ और संचार का अभाव, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की सीमित पहुंच, पेयजल संकट और लंबे समय तक फैला अविश्वास। इन सबके मूल में नक्सलवाद रहा, जिसने न केवल विकास को रोका, बल्कि शासन और जनता के बीच दूरी भी पैदा की। अब जब प्रभावित क्षेत्रों में शांति बहाल हो रही है, तो यह समय है कि विकास की रफ्तार हालात से तेज हो।
मुख्यमंत्री द्वारा मंत्रालय में शीर्ष अधिकारियों के साथ की गई बैठक इस बात का संकेत है कि सरकार बस्तर को लेकर अब अलग नजरिया अपना रही है। शिक्षा, स्वास्थ्य, सडक़, बिजली, पानी और संचार जैसे मूलभूत क्षेत्रों पर आधारित एक्शन प्लान को मिशन मोड में लागू करने का निर्णय केवल घोषणा नहीं, बल्कि जवाबदेही तय करने की पहल है। विशेष केंद्रीय सहायता के लिए प्रस्ताव भेजने और विभागीय सचिवों को नियमित रूप से बस्तर का दौरा करने के निर्देश इस बात की गारंटी बनने चाहिए कि योजनाएं फाइलों तक सीमित न रहें।
विकास की इस यात्रा में बुनियादी सुविधाएं सबसे अहम कड़ी हैं। छूटे गांवों का विद्युतीकरण, मोबाइल टावरों की स्थापना में तेजी, फ्लोराइड प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षित पेयजल की व्यवस्था और आधार कार्ड व बच्चों की संपूर्णत: चिंता जैसे कदम बस्तर के आम नागरिक के जीवन में वास्तविक बदलाव ला सकते हैं। जब सडक़, बिजली और नेटवर्क पहुंचेंगे, तभी शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के अवसर भी खुलेंगे।
सरकार का जोर केवल भौतिक विकास तक सीमित नहीं है। बस्तर ओलंपिक और बस्तर पंडुम जैसे आयोजनों में दिखी स्वस्फूर्त भागीदारी बताती है कि यहां के लोग शांति और विकास को अपनाने के लिए तैयार हैं। पर्यटन को आजीविका से जोडऩे की योजना-होम-स्टे, बस्तर टूरिज्म कॉरिडोर और स्थानीय युवाओं को गाइड के रूप में प्रशिक्षित करना-आर्थिक सशक्तिकरण के साथ सांस्कृतिक सम्मान का रास्ता खोलती है। असल चुनौती यही है कि नक्सलवाद की हिंसक विचारधारा दोबारा सिर न उठा सके। इसके लिए सतत संवाद, भरोसेमंद प्रशासन और विकास का समान वितरण जरूरी है। यदि प्रस्तावित तीन साल का एक्शन प्लान ईमानदारी, समन्वय और संवेदनशीलता के साथ लागू हुआ, तो बस्तर निश्चित ही चुनौतियों से बाहर निकलकर विकास की एक नई, प्रेरक गाथा लिखेगा।







