आमतौर पर राजनीति में सुख-दुख, दोनों ही अवसर ‘दिखावे’ के आयोजन बन जाते हैं। लेकिन जब ऐसा नज़ारा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के किसी पदाधिकारी के यहां दिखे, तो चर्चा होना स्वाभाविक है। हाल ही में संघ के एक वरिष्ठ भाईजी (मालवा प्रांत प्रचारक) के पिताश्री का विदिशा में निधन हुआ। जहां सादगी की उम्मीद थी, वहां श्रद्धांजलि सभा अप्रत्याशित भव्यता में बदल गई। सत्ता और संगठन के लगभग सभी बड़े चेहरे शोक-संवेदना प्रकट करने के नाम पर हाजिरी लगाने पहुंचे। दृश्य कुछ यूं लगा मानो चुनावी दौर की तैयारियां शुरू हो गई हों। नारदजी कहते हैं, संघ परंपरा में न तो उत्सव में आडंबर होता है, न शोक में तामझाम। शायद यही कारण है कि विदिशा का शोक प्रसंग संघ परिवार और सियासी गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है।
नेताजी खेलेंगे नहीं, तो पूरा खेल बिगाड़ देंगे
मप्र कांग्रेस के एक बुर्जुआ नेताजी इन दिनों इस अंदाज़ में राजनीति कर रहे हैं कि ‘खेलेंगे नहीं, तो पूरा खेल ही बिगाड़ देंगे!’ चर्चा है कि नेताजी अपने पुत्र को प्रदेश कांग्रेस का मुखिया बनवाने की इतनी आतुरता में हैं कि वर्तमान अध्यक्ष का पूरा गेम लगाने पर आमादा हैं। उनकी हर चाल यही दिखाती है कि वे न प्रदेश अध्यक्ष को खुलकर काम करने दे रहे हैं, न ही पार्टी को किलेदारों के शिकंजे से मुक्त होने दे रहे हैं। नतीजा यह कि मप्र कांग्रेस न विपक्ष की भूमिका में दम दिखा पा रही है, न सत्तारूढ़ भाजपा को कोई असली चुनौती दे पा रही है। नारदजी कहते हैं, इन्हीं नेताजी की तिकड़मों से ऊबकर कभी श्रीमंत ने भाजपा का दामन थाम लिया था। और कमलनाथ की अच्छी-भली चलती सरकार का पंद्रह महीने में ही ‘बंटाढार’ हो गया था।
जन्मदिन के बहाने ‘भाईसाब’ का दीपावली शो-ऑफ
दीपावली की रात राजधानी के राजनीतिक गलियारों में मिठाइयों से ज़्यादा चर्चा ‘नामचीन भाईसाब’ के शो की रही। अंग्रेजी कैलेंडर के मुताबिक तो भाईसाब का जन्मदिन बीत चुका था, मगर भाईसाब ने कहा कि जब ‘दीप जले तो नाम भी चमके।’ सो, दीपावली (20 अक्टूबर) को भाईसाब ने एक बार फिर जन्मदिन मना लिया, और वो भी पूरे पॉलिटिकल स्टाइल में। उनके बंगले का नज़ारा किसी सियासी शक्ति प्रदर्शन से कम नहीं था। नेता, कार्यकर्ता और समर्थकों सब हाजिर थे। मिठाइयों और बधाइयों के बीच ‘राजनीतिक खुशबू’ भी साफ महसूस हो रही थी। भाईसाब का ‘इशारा साफ था कि राजनीति के खेल में मध्यप्रदेश में अब भी बास मैं ही हूं।’ नारदजी कहते हैं कि दीपों की रोशनी में ‘नामचीन भाईसाब’ ने बर्थ-डे के नाम पर अपनी राजनीति को खूब चमकाया।
अध्यक्षजी हाजिर हों
भोपाल के पुराने शहर स्थित जिला भाजपा कार्यालय में इन दिनों अध्यक्षजी हाजिर हों, हाजिर होंं! की आवाजें गूंज रही हैं। दरअसल, जिला भाजपा के नवेले अध्यक्ष को पुराने शहर स्थित जिला कार्यालय का माहौल रास नहीं आ रहा है। स्थिति यह है कि जब भी अध्यक्षजी को कोई बैठक करनी होती है, तो वे जिले के कार्यकर्ताओं-पदाधिकारियों को जिला कार्यालय बुलाने के बजाय सीधे प्रदेश भाजपा कार्यालय में बुला लेते हैं। अध्यक्षजी के इस रवैये से न सिर्फ जिले के कार्यकर्ता- पदाधिकारी परेशान हैं, बल्कि यह सवाल भी जोर पकडऩे लगा है कि आखिर अध्यक्षजी जिला कार्यालय जाने से कतराते क्यों हैं? क्या वजह है कि जिले की बैठकों का मंच प्रदेश कार्यालय बनाया जा रहा है? और अहम सवाल कि, आखिर अध्यक्षजी इससे कार्यकर्ताओं को क्या संदेश देना चाहते हैं?







