प्रदेश के ‘पूर्ववर्ती सरकार’ के खासुलखास और भाजपा के एक प्रदेश पदाधिकारी भाईसाब इन दिनों खुफिया एजेंसियों के रडार पर बताए जा रहे हैं। पदाधिकारी भाईसाब के आवास और गतिविधियों पर लगातार जासूसी नजर रखी जा रही है। बताया जा रहा है कि पदाधिकारी भाईसाब कहां आ-जा रहे हैं, उनके घर कौन-कौन आ रहा है, दिनभर किन लोगों से मुलाकात हो रही है, उनकी हर गतिविधि पर बारीकी से नजर रखी जा रही है। निगरानी का दायरा केवल सार्वजनिक गतिविधियों तक सीमित नहीं, बल्कि निजी संपर्कों पर भी नजर रखी जा रही है। हालांकि, यह जासूसी कौन करा रहा है और इसके पीछे क्या वजह है, फिलहाल स्पष्ट नहीं हो पाया है। सवाल यह भी है कि निगरानी के निशाने पर केवल पदाधिकारी भाईसाब हैं या इसके जरिए किसी बड़े राजनीतिक घटनाक्रम की जमीन तैयार की जा रही है। इन तमाम सवालों के जवाब फिलहाल अभी रहस्य बने हुए हैं।
श्रीमंत इतिहास सुना रहे या ताकत का एहसास करा रहे ?
श्रीमंत इन दिनों लगभग हर रोज नए और अलग अंदाज में नजर आ रहे हैं। ऐसा लगता है मानो वे लगातार अपनी राजनीतिक हैसियत और ग्वालियर किले की ताकत का एहसास करा रहे हों। कभी वे किस्सागोई के अंदाज में बताते हैं कि उनके दादा ने किस तरह वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई की मदद की थी, तो कभी यह दिलचस्प राज खोलते हैं कि उनकी आजी मां उनकी इच्छा से उनका नाम विक्रमादित्य रखना चाहती थीं, लेकिन किस्मत ने उन्हें ज्योतिरादित्य नाम दे दिया। इस नामकरण के पीछे की कहानी भी वे बड़े रोचक ढंग से सुनाते हैं। यहीं नहीं, कभी वे सिंधिया रियासत की पुरानी सरहदों का जिक्र छेड़ देते हैं ग्वालियर से मालवा तक, उज्जैन से धार-झाबुआ तक फैले उस दौर की तस्वीर खींचते हैं, जब सत्ता और सामर्थ्य उनके खानदान की पहचान हुआ करती थी। नारदजी कहते हैं कि श्रीमंत का अपने राजशाही इतिहास को बार-बार उकेरना और सुनाना यूं ही नहीं है। इसके पीछे संदेश बिल्कुल साफ है। इस बहाने वे दिल्ली दरबार को यह जताने की कोशिश कर रहे हैं कि उन्हें राजनीतिक तौर पर हल्के में लेना या नजरअंदाज करना भारी भूल साबित हो सकती है।
भाजपा मुख्यालय में मोहतरमा का हाईवोल्टेज ड्रामा!
भाजपा मुख्यालय में कार्यकर्ताओं की समस्याएं सुनने के लिए आयोजित मंत्रियों की साप्ताहिक बैठकी उस समय हाईवोल्टेज ड्रामे में बदल गई, जब एक मोहतरमा ने अचानक हंगामा शुरू कर दिया। हंगामे के पीछे की पूरी कहानी और कारणों पर फिलहाल चर्चा छोड़ भी दी जाए, लेकिन जिस मांग को लेकर वह मंत्रियों के सामने अड़ी रही, उसने राजनीतिक गलियारों में कई सवाल खड़े कर दिए हैं। मोहतरमा इस दौरान प्रदेश के एक अखबार मालिक और एक कथित खनन माफिया का बार-बार नाम ले रही थी। मोहतरमा का कहना था कि जब तक इन दोनों पर कार्रवाई नहीं होती, वह भाजपा मुख्यालय से नहीं जाएंगी। हालांकि, देर तक चले हाईवोल्टेज ड्रामे के बाद मान-मनौव्वल कर मोहतरमा को भाजपा मुख्यालय से चलता कर दिया गया। लेकिन राजधानी के राजनीतिक गलियारों में अब एक ही सवाल गूंज रहा है, आखिर इस पूरे घटनाक्रम के पीछे का असल माजरा क्या था? मोहतरमा का यह हंगामा कई अनकहे सवाल छोड़ गया।
भोपाल महापौर का ‘ज्ञान’, जनता हैरान!
इंदौर में जहरीले पानी के सेवन से 20 लोगों की मौत के बाद पूरा प्रदेश दहशत में है। ऐसे भयावह हालात में राजधानी भोपाल की कई कॉलोनियों से गंदे और बदबूदार पानी की शिकायतें सामने आना चिंता को और बढ़ा देता है। लोग डरे हुए हैं, गुस्से में हैं और प्रशासन से तुरंत जवाब की उम्मीद कर रहे हैं। लेकिन जब खबरनवीस महापौर से इन गंभीर सवालों के जवाब लेने पहुंचे, तो राजधानी की प्रथम नागरिक से हर सवाल का एक ही जवाब मिला ‘यह अधिकारी बताएंगे।’ ऐसा लगा मानो यह महापौर नहीं, बल्कि केवल फाइलों पर दस्तख्त करने वाली औपचारिक मुहर हों। जिसे न तो नगर निगम में कर्मचारियों की भारी कमी का कोई ज्ञान, न ही शहर में पानी की जांच की व्यवस्था की कोई समझ। नारदजी पूछ रहे हैं कि आखिर पार्टी नेतृत्व ने किन ‘असाधारण योग्यताओं’ को देखकर ऐसी ‘मूढ़मति’ नेत्री को भोपाल जैसे बड़े शहर की जिम्मेदारी सौंपी? जिसकी ‘सार्वजनिक अज्ञानता’ न सिर्फ जनता को हैरान कर रही है, बल्कि खुद पार्टी की भी खुली किरकिरी करा रही है।
कप्तान के फरमान ने कराई पुलिस महकमे की फजीहत
बुंदेलखंड के एक जिले के पुलिस कप्तान का अजीबो-गरीब फरमान इन दिनों प्रदेश के प्रशासनिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है। यह फरमान न सिर्फ कप्तान साहब की ‘समझ’ पर सवाल खड़े कर रहा है, बल्कि मप्र पुलिस की भी फजीहत करा रहा है। दरअसल, एक माह की पुलिस ट्रेनिंग से लौटते ही कप्तान साहब ने करीब दो दर्जन अधीनस्थ अधिकारियों-कर्मचारियों को कारण बताओ नोटिस थमा दिए। गुनाह इतना-सा था कि अधीनस्थों ने पत्राचार में ‘प्रभारी पुलिस अधीक्षक’ लिखने के बजाय सिर्फ ‘पुलिस अधीक्षक’ लिख दिया। इसी ‘भारी अपराध’ पर साहब इतने नाराज़ हुए कि तीन दिन के भीतर जवाब तलब कर लिया गया। इतना ही नहीं, संतोषजनक जवाब न मिलने की स्थिति में सेवा से निलंबन की चेतावनी भी दे डाली गई। नारदजी कहते हैं कि, लगता है कप्तान साहब यह भूल बैठे हैं कि कुर्सी आती-जाती ‘माया’ है । आज जिस कुर्सी पर आप विराजमान हैं, कल वहां कोई और होगा।







