राजधानी के सत्ता गलियारों में इन दिनों बड़ा दिलचस्प दृश्य देखने को मिल रहा है। दो नवधनाढ्य, जिनके नाम का पहला अक्षर ‘एस’ है, ‘सर्वशक्तिमान’ बनने की साधना में जुटे हैं और इस साधना का नया नाम है- ‘भाईसाब परिक्रमा’। सुबह की बैठक हो, रात्रि भोज हो या निजी समारोह-जहां भाईसाब, वहां ये दोनों ‘एस’। हर फोटो में फ़र्स्ट लाइन, चेहरे पर खास मुस्कान और आचरण में एक ही संदेश ‘हम हैं भाईसाब के सबसे खास।’ भाईसाब की कृपा से दोनों की किस्मत मेडिकल, रियल एस्टेट और माइनिंग सेक्टर में इस कदर चमकी है कि तरक्की दिन-दूनी और रात-चौगुनी कही जाए तो भी कम है। आलम यह है कि प्रदेश की ब्यूरोक्रेसी से लेकर जिला प्रशासन तक, इनके नाम से फाइलें स्वत: ही शिष्टाचार धारण कर लेती हैं। नारदजी कहते हैं कि, यह परिक्रमा भक्ति है, रणनीति है या फिर व्यापार? जो भी हो, इतना तय है कि दोनों ‘एस’ का साम्राज्य अब हर दिशा में फैल चुका है-भाईसाब की कृपा से..!
कांग्रेस के ‘माननीय’ भाजपा से दिल लगाने को आतुर?
राजधानी के राजनीतिक गलियारों में इन दिनों फुसफुसाहट है कि कांग्रेस के एक ‘माननीय’ का दिल भाजपा पर आ चुका है। बस इंतज़ार है तो सही रिश्ता करवाने वाले की। बताया जाता है कि माननीय ने पहले ‘श्रीमंत’ के जरिए भाजपा हाईकमान को राजनीतिक प्रेम-पत्र भिजवाया था, लेकिन शर्तों पर सहमति न बनने से बात आगे नहीं बढ़ पाई। अब फिर माननीय ने अपने एक रिश्तेदार के माध्यम से संघ के एक प्रभावशाली ‘भाईसाब’ तक पहुंच बनाई है। हालांकि ‘भाईसाब’ भी कदम बेहद सोच-समझकर ही बढ़ा रहे हैं। वजह, माननीय ग्वालियर-चंबल क्षेत्र से ताल्लुक रखते हैं और पिछले चुनाव में तत्कालीन सरकार के ‘संकटमोचक’ को हराकर विधानसभा पहुंचे हैं। ऐसे में अब सबकी निगाहें इस पर टिकी हैं कि माननीय का भाजपा ‘प्रवेश’ कब और कैसे होगा, या फिर यह राजनीतिक प्रेमकहानी एक बार फिर अधूरी ही रह जाएगी? नारदजी कहते हैं कि, राजनीति में रिश्ते दिल से नहीं, समीकरणों से तय होते हैं, और समीकरण अक्सर आखऱिी मिनट में बदल भी जाते हैं।
क्यों विधायकजी को गले में लटकाए घूम रहे मामाजी?
प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान में केंद्रीय मंत्री (मामाजी) इन दिनों अपने ही खास विधायकजी के कारण असहज स्थिति में हैं। विधायकजी की हरकतें न सिर्फ पार्टी की छवि को नुकसान पहुंचा रही हैं, बल्कि केंद्रीय नेतृत्व की नजरों में भी ‘मामाजी’ की ‘सहज और सरल’ नेता वाली छवि पर भी असर डाल रही है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि विधायकजी अब ‘मामाजी’ के लिए ऐसी मजबूरी बन गए हैं, जिन्हें न खुलकर समर्थन देना आसान है और न दूरी बनाना। स्थिति यह है कि ‘मामाजी’ की राजनीतिक फाइल में विधायकजी हर दिन एक नये विवाद का ‘क्षेपक’ जोड़ रहे हैं। नारदजी कहते हैं कि आखिर विधायकजी ने ऐसी कौनसी राजनीतिक नस पकड़ ली है, जो तमाम विरोध, असंतोष और दबाव के बावजूद विधायकजी को ‘मामाजी’ अपने गले में लटकाये-लटकाये घूम रहे हैं?
अपनी ही सरकार से खफ़़ा हैं ‘मंत्रीजी’
प्रदेश के एक मंत्रीजी इन दिनों अपने तेवर और कार्यशैली की वजह से खासे चर्चाओं में हैं। कहना चाहिए कि उनका स्वभाव कुछ ऐसा है कि मानो नाराजग़ी का तेल कभी सूखता ही नहीं। कांग्रेस छोडक़र भाजपा का दामन थामे उन्हें पांच साल से अधिक हो चुके हैं। उन्हें मंत्री पद भी मिला और संगठन से भरपूर मान-सम्मान भी, लेकिन भाजपा का परिवेश और संस्कार अब तक उनके स्वभाव में घुल नहीं पाए। सरकार के बारे में जऱासी आलोचनात्मक चर्चा छेड़ दीजिए, फिर देखिए मंत्रीजी की अपनी ही सरकार पर टिप्पणियों की गडग़ड़ाहट शुरू हो जाती है। पानी पी-पीकर वे अपनी ही सरकार को कोसना शुरू कर देते हैं। ग्वालियर संभाग से ताल्लुक रखने वाले मंत्रीजी अब भी मन के किसी कोने में अपनी पुरानी पार्टी की परछाईं ढोते प्रतीत होते हैं। नारदजी कहते हैं कि राजनीति में दल बदलना आसान है, पर ‘मन की ऊर्जा’ बदलना कठिन। और जब तक मन न बदले, तो गुस्सा भी तवे पर चढ़ी रोटी की तरह बार-बार फूलता ही रहता है।







