भोपाल। बिहार की राजनीति में इस बार बड़ा रोचक दृश्य देखने को मिला। मंच पर न सही, पर मंच के आसपास चमक रहीं मध्यप्रदेश की कुछ सुदर्शनाएं चर्चा का विषय बनी रहीं। ये न तो पार्टी की प्रचार सूची में थीं, न किसी आधिकारिक जिम्मेदारी पर, पर फिर भी हर सभा, हर रैली में मौजूद । कभी फलां बड़े नेता संग मुस्कराती सेल्फी, तो कभी अमुक दिग्गज के साथ मंच साझा करती तस्वीरें। बिहार चुनाव में इन सुदर्शनाओं की सक्रियता ने सबका ध्यान खींच लिया। चर्चा यह भी है कि प्रचार इनके लिए बहाना था, मकसद तो बड़े नेताओं की नजऱों में आना और अपने ‘ब्रांड वैल्यू’ को बढ़ाना था। सवाल है कि आखऱि ये सुदर्शनाएं बिहार चुनाव में किसके अधिकृत आदेश पर पहुंचीं? कौन था वह ‘अदृश्य निर्देशक’ जिसने इन्हें बिहार के चुनावी रंगमंच पर उतारा?
सीएम की बैठकों में ‘पदाधिकारी’ का क्या काम?
प्रदेश भाजपा के एक पदाधिकारी भाईसाब इन दिनों राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में चर्चा के केंद्र बने हुए हैं। वजह भी खास है-मुख्यमंत्री की लगभग हर सरकारी बैठक और कार्यक्रम में उनकी नियमित मौजूदगी। राजधानी में होने वाले कई ऐसे सरकारी आयोजन हैं, जिनमें कई बार मंत्री, विधायक या सांसद तक नहीं दिखते, लेकिन ये पदाधिकारी भाईसाब हर बार सीएम के साथ ऐसे उपस्थित रहते हैं मानो कह रहे हों ‘मान न मान, मैं तेरा मेहमान।’ अब अधिकारियों से लेकर जनप्रतिनिधियों तक के मन में एक ही सवाल घूम रहा है कि, क्या अब सरकारी कामकाज पर भी संगठन की निगरानी शुरू हो गई है, या फिर संगठन के प्रतिनिधि सरकारी मंचों पर भी सक्रिय भूमिका निभाने लगे हैं? नारदजी कहते हैं कि भाजपा संगठन का कोई पदाधिकारी इस तरह पहली बार सरकारी मंचों पर इतनी सक्रियता दिखा रहा है, इसलिए चर्चा होना स्वाभाविक है।
‘पूर्व’ हो गए, पर नहीं छूटा ‘मुख्यालय मोह’
मप्र भाजपा की नई प्रदेश कार्यकारिणी तो घोषित हो गई, लेकिन कुछ पदाधिकारी भाईसाब अब भी खुद को ‘पूर्व’ मानने को तैयार नहीं हैं। बताते हैं कि भाजपा मुख्यालय में दो ऐसे पूर्व पदाधिकारी हैं, जो पांच साल तक दो सटे हुए चेम्बरों के स्वामी रहे और उस दौरान पार्टी में उनका खासा जलवा रहा। अब भले ही नई कार्यकारिणी में उन्हें जगह नहीं मिली हो, लेकिन मुख्यालय से लगाव ऐसा कि रोज़ाना वहीं डेरा जमाए रहते हैं। बताया जाता है कि एक पूर्व पदाधिकारी ने तो दोबारा चेम्बर पाने की गुपचुप जुगत भी कर ली है, जबकि दूसरे भाईसाब किसी ‘नए दायित्व’ की आस में मुख्यालय के गलियारों में नियमित चक्कर काट रहे हैं। पार्टी दफ्तर के गलियारों में चर्चा है कि भाईसाबों का पद तो चला गया, पर चेम्बर का मोह नहीं गया।
इंदौरी भिया की पचमढ़ी पॉलिटिक्स
पचमढ़ी के शांत और सुरम्य पहाड़ों में जब कांग्रेस का चिंतन-प्रशिक्षण शिविर आयोजित हुआ, तो वहां चिंतन से ज्यादा चयन की राजनीति दिखाई दी। राहुल गांधी भले ही नए जिला अध्यक्षों को राजनीति के संस्कार सिखाने पहुंचे थे, पर असली पाठ तो प्रदेश कांग्रेस के मुखिया इंदौरी भिया ने पढ़ाया-बड़ों को दूर रखो, तभी नया खेमा फले-फूले। इस बार शिविर में वरिष्ठ नेताओं की जगह युवा चेहरों की ही पूछ-परख थी। न वरिष्ठ नेताओं को आमंत्रण मिला, न परामर्श का अवसर-बस नई पीढ़ी के नेतृत्व का उदघोष। संदेश साफ था-अब कांग्रेस का भविष्य अनुभवी के कंधों पर नहीं, बल्कि युवा हाथों में सौंपा जा रहा है।नारदजी कहते हैं कि राजनीति में जो बड़ों को दरकिनार करता है, वह आगे तो निकल जाता है, पर ठहर नहीं पाता। कहीं यह पचमढ़ी का पर्वतारोहण इंदौरी भिया के लिए राजनीतिक फिसलन साबित न हो जाए…!







