-महेश दीक्षित
अपने विवादास्पद वक्तव्यों से कई बार खुद की और सरकार की किरकिरी करा चुके प्रदेश के एक वरिष्ठ मंत्रीजी फिर चर्चाओं में हैं। मंत्रीजी इस बार ‘सेल्दा माल’ (हरसूद) के प्रति रागात्मकता को लेकर चर्चाओं में हैं। दरअसल, ‘सेल्दा माल’ मंत्रीजी के विधानसभा क्षेत्र का डूब प्रभावित गांव है। मंत्रीजी इस गांव के प्रेम में इतने डूबे हैं कि, हर हफ्ते इस गांव का दौरा करने पहुंच जाते हैं। नारदजी को गांव के लोगों ने बताया कि, मंत्रीजी हर हफ्ते गांव तो आते ही हैं, गांव में रात भी रूकते हैं। मंत्रीजी का पूरा मध्यप्रदेश छोड़, एक गांव के प्रेम में डूबना शोध का विषय तो बनता है।
भाईसाब की कुर्सी गई, तो रूतबा भी गया
15 फरवरी 2020 से 2जुलाई 2025 (साढ़े पांच साल) तक मध्यप्रदेश भारतीय जनता पार्टी में सर्वशक्तिमान रहे एवं संघ के कृपा पात्र ‘भाईसाब’ अध्यक्ष की कुर्सी से क्या हटे, कार्यकर्ताओं ने ‘भाईसाब’ से दूरियां बनाना शुरू कर दिया है…बंगले से निष्ठावान कार्यकर्ताओं की भीड़ छंटने लगी है…और पार्टी के बैनर्स-पोस्टर्स से ‘भाईसाब’ का चेहरा गायब हो चुका है…इतना ही कार्यकर्ताओं ने ‘भाईसाब’ को छोटे-मोटे कार्यक्रमों में भी बुलाना बंद कर दिया है…भाईसाब, राजनीति भी क्या कमाल की चीज है…कुर्सी गई, तो रुतबा भी गया!
इस प्रचार का मतलब क्या है..?
हाल ही में ऐसा प्रचारित किया गया कि केंद्रीय मंत्री एवं मामाजी उपनाम से विख्यात नेताजी को भूलने की बीमारी हो गई है…प्रचारित किया गया कि, मामाजी धर्मपत्नी के साथ एक कार्यक्रम में पहुंचे…इसके बाद वे धर्मपत्नी को भूलकर कार्यक्रम से चले गये..इस बीच जब उन्हें याद दिलाया गया कि आप धर्मपत्नी को भूल आये हैं, तो वे गाडिय़ों के काफिले को लौटाकर धर्मपत्नी को लेने पहुंचे… नारदजी कहते हैं कि, जब मामाजी का नाम राष्ट्रीय अध्यक्ष की कुर्सी के लिये चल रहा हो, तब इस सुनियोजित प्रचार का क्या औचित्य हो सकता है? जो भी हो मामाजी को रोकने दिल्ली कुछ भी कर-करा सकती है।
सिंडीकेट से परेशान साहब
मध्यप्रदेश में प्रशासनिक शीर्ष पर रह चुके एक ‘साहब’ इन दिनों बेहद परेशान हैं। दरअसल, जब से ‘साहब’ रिटायर्ड हुये हैं, तब से प्रताड़ित रह चुके राज्य मंत्रालय के अधिकारियों के एक सिंडीकेट ने ’साहब’ के खिलाफ मोर्चा-सा खोल दिया है। सिंडीकेट ने ‘साहब’ के कारनामों की फाइलें शुभ चिंतकों के माध्यम से लोकायुक्त-ईओडब्ल्यू में पहुंचानी शुरू कर दी है। इनमें से कुछ शिकायतों में जांच भी शुरू हो गई है। नारदजी कहते हैं कि जो भी हो, कर्मों की परछाई ताउम्र पीछा नहीं छोड़ती है।
मंत्रीजी पर भारी ओएसडी
मध्यप्रदेश सरकार के मंत्रियों पर उनके ओएसडी भारी पड़ रहे हैं। इतने भारी कि, मंत्रीजी को क्या निर्णय लेना है, किसका काम करना है और किसका नहीं, यह निर्णय भी मंत्रीजी के बजाय उनके ओएसडी ही ले रहे हैं। अब शिक्षा वाले महकमे के एक मंत्री के ओएसडी का ही मामला ले लीजिए। इस ओएसडी ने मंत्रीजी के नाम पर तबादला सीजन में करोड़ों कमाये। विभाग के अधिकारियों और पार्टी कार्यकर्ताओं ने ओएसडी की मंत्री से शिकायत भी की है। लेकिन जलवा देखिये, कोई ओएसडी का बाल भी बांका नहीं कर सका।







