भाजपा के नए प्रदेश अध्यक्ष के आते ही मुख्यालय का वातावरण बदलने लगा है। उन्होंने सबसे पहले पार्टी की गाड़ी खुद लेने से मना कर दिया और पदाधिकारियों को भी साफ संदेश दे दिया, भैया, अब गाड़ी पार्टी की नहीं, अपनी चलाइए। बस, फिर क्या था? जिन पदाधिकारियों के घर-आंगन में वर्षों से पार्टी की गाडिय़ां खड़ी थीं, उन्हें धीरे-धीरे मुख्यालय में वापस बुलाया जा रहा है। आगे का प्लान और भी मजेदार है, डीजल-पेट्रोल पीने वाली डीलक्स गाडिय़ों को बेचकर इलेक्ट्रिक गाडय़िों को खरीदा जायेगा। वाह अध्यक्षजी! अब गाडय़िों के नाम पर जो डीजल-पेट्रोल का ‘चमत्कार’ चलता था वो तो बंद होगा ही, साथ ही मुख्यालय का प्रदूषण भी कम होगा। इसके साथ भाजपा मुख्यालय में शुचिता की नई राजनीति की शुरुआत होगी।
कौन करा रहा मामाजी की जासूसी?
नारदजी को सुनने में आया है कि मामाजी की मध्यप्रदेश में जासूसी हो रही है। दरअसल, मामाजी भले दिल्ली भेज दिये गये हों, लेकिन किसी न किसी बहाने वे मध्यप्रदेश में लगातार अपनी राजनीतिक सक्रियता बनाये हुये हैं। यही वजह है प्रतिद्वंदियों ने मामा के पीछे जासूस लगा दिये हैं। मामाजी मध्यप्रदेश में कहां जा रहे हैं, क्या कर रहे हैं किससे मिल रहे हैं, उनकी पल-पल की गतिविधियों पर नजर रखी जा रही है। और इसकी जानकारी हर दिन ऊपर दिल्ली पहुंचाई जा रही है। खैर, मामाजी के मध्यप्रदेश में सक्रिय रहने के क्या राजनीतिक शुभ-लाभ हैं, यह तो वो जानें। लेकिन यह तो तय है कि जो जासूसी करा रहे हैं, वो जरूर मामाजी की सक्रियता से डरे हुए हैं।
संकट में ‘संकटमोचक’
मध्यप्रदेश की पिछली सरकारों में ‘संकटमोचक’ के नाम से ख्यात और सीएम पद के दावेदार रहे भाजपा के एक कद्दावर नेताजी (पूर्व मंत्री) के ग्रह-नक्षर इन दिनों बेहद अशांत चल रहे हैं। नेताजी विधानसभा चुनाव क्या हारे, राजनीतिक विरोधी उनके राजनीतिक कद और प्रतिष्ठा को खत्म करने हाथ-पांव धोकर पीछे पड़ गये हैं। बताते हैं कि, विरोधी सोशल मीडिया पर नेताजी के खिलाफ ‘चरित्रहनन अभियान’ तो चला ही रहे हैं, इसके साथ नेताजी के पुराने गड़े मुर्दे उखाड़-उखाडक़र भाजपा हाईकमान तक पहुंचा रहे हैं। अब देखना यह है कि, संकटमोचक किस अनुष्ठान विधि से अशांत ग्रह-नक्षरों को शांत करते हैं।
इंदौरी भिया परेशान, कोई नेता नहीं मान रहा
मप्र कांग्रेस के मुखिया इंदौरी भिया की हालत आजकल बड़ी दयनीय है। न कोई उन्हें अपना नेता मान रहा, न कोई उनकी बात को गंभीरता से सुन रहा। नतीजा यह कि पार्टी के बड़े-बड़े लंबरदार-किलेदार नेता न तो उनकी बैठकों में पहुँचते हैं, न ही किसी मुद्दे पर सलाह-मशविरा करना जरूरी समझते हैं। उल्टा, जब बहुत जरूरी हो जाता है तो भिया को ही लंबरदारों के दरबार में जाकर हाजऱिी बजानी पड़ती है। नारदजी कहते हैं कि, कुल मिलाकर लंबरदारों से पार्टी को मुक्ति दिलाने के लिए राहुल का ‘इंदौरी भिया’ वाला प्रयोग भी विफल हो गया!
पुलिस के जनसेवक का रसूख
मध्यप्रदेश पुलिस का एक निरीक्षक (टीआई) ऐसा भी है, जिसके रसूख को जानकर आप दंग रह जाएंगे। राजधानी के कई थानों का ‘मिज़ाज’ बदल चुके इस जनसेवक की खासियत यह है कि मामला शहर के किसी भी थानाक्षेत्र का हो, किसी को फंसाना हो-बचाना हो, उलझाना हो या सुलझाना हो, दाम लेकर चुटकियों में तोड़ करा देता है। इसी पुलिसिया जादूगरी के चलते यह जनसेवक बड़े-बड़े साहबों का हमराज़ और राजधानी की एक आलीशान होटल और विकसित हो रही एक कॉलोनी की प्राइवेट लिमिटेड में अप्रत्यक्ष पार्टनर बन बैठा है। बता दें कि, यह वही जनसेवक है, जिसे पिछले दिनों एक स्कूल बस कांड की जांच में होशियारी (या कहें लापरवाही) करने पर लाइन अटैच कर दिया गया था।







