गाजियाबाद की भारत सिटी सोसायटी से तीन नाबालिग बहनों की आत्महत्या की दर्दनाक घटना ने हमें यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि डिजिटल दुनिया की चमक कितने गहरे तक बचपन को प्रभावित कर रही है। 12, 14 और 16 वर्ष की इन बहनों की भावनात्मक निर्भरता और ऑनलाइन गेमिंग की लत ने उन्हें वास्तविक जीवन से अलग कर दिया, और यह अंतत: एक त्रासदी में बदल गया।
यह घटना अकेली नहीं है। भारत में बच्चों और किशोरों के बीच आत्महत्या की संख्या चिंताजनक तरीके से बढ़ रही है। एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार 2017 से 2019 के बीच 14-18 आयु वर्ग के लगभग 24,000 बच्चों ने आत्महत्या की। यह केवल तीन वर्षों का आंकड़ा है और यह दिखाता है कि बच्चों की मानसिक चुनौतियाँ कितनी गंभीर हो चुकी हैं। 2020 में, लगभग 11,396 बच्चों ने आत्महत्या की, यानी प्रति दिन औसतन 31 बच्चों ने अपनी जान दे दी। और यह संख्या 2019 की तुलना में लगभग 18त्न अधिक थी, जिसमें एक बड़ा कारण मानसिक तनाव और सामाजिक अलगाव बताया गया।
2022 के एनसीआरबी आंकड़ों में भी सामने आया कि 10,295 से अधिक 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों ने आत्महत्या की, जिसमें लड़कियों की तुलना में लडक़ों की संख्या थोड़ी कम थी, पर आत्महत्या की प्रवृत्ति स्पष्ट रूप से भारी है। ये आंकड़े दिखाते हैं कि बच्चों के बीच आत्महत्या अकेले एक पारिवारिक या व्यक्तिगत समस्या नहीं है, बल्कि एक सामाजिक और मानसिक स्वास्थ्य संकट बन चुका है। डिजिटल दुनिया, जहां स्क्रीन, गेम्स और वर्चुअल संबन्धों की चमक मिली है, वह बच्चों के भावनात्मक संतुलन, स्वयं-पहचान और सामाजिक व्यवहार को गहराई से प्रभावित कर रही है।
अब यह एक अकेला खेल नहीं रह गया। डिजिटल जुड़ाव का स्तर बच्चों के विचारों, भावनाओं और जीवन-निर्णयों तक पहुंच चुका है। जब वास्तविक जीवन में संवाद टूटता है, तो बच्चे डिजिटल दुनिया को ही अपनी पहचान मानने लगते हैं, और विपरीत स्थिति में नकारात्मक भावनाओं का बोझ असहनीय बन जाता है। माता-पिता, शिक्षक और समाज को यह समझना होगा कि तकनीक केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए एक जिम्मेदारी का क्षेत्र भी है। संवाद, समझ और मानसिक समर्थन के बिना चमकदार डिजिटल दुनिया एक अंधेरी खाई बन सकती है, जिसमें हमारा बचपन धीरे-धीरे खोता जा रहा है।






