महेश दीक्षित
चाइनीज मांझा कभी पतंगबाजी का एक साधन भर था, लेकिन आज यह धीरे-धीरे मौत का सामान बनता जा रहा है। त्योहार की खुशी और आसमान में उड़ती पतंगों के बीच यह खतरनाक धागा न जाने कितनी जिंदगियों की डोर काट चुका है। हाईकोर्ट द्वारा इस विषय पर जताई गई गंभीर चिंता बताती है कि समस्या कितनी भयावह हो चुकी है और अब इसे हल्के में लेने की गुंजाइश बिल्कुल नहीं बची है।
कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा है कि प्रतिबंध और आदेशों के बावजूद चाइनीज मांझे से मौतें होना दुर्भाग्यपूर्ण है। यह टिप्पणी प्रशासन के लिए आईना है, जो अब तक कई बार केवल कागजों में तैयारी दिखाता रहा है। अगर कानून जमीन पर सख्ती से लागू होता, तो शायद गुलशन जैसे मासूमों की जान न जाती। 17 वर्षीय बालक की मौत ने यह साबित कर दिया कि चाइनीज मांझा अब खेल का सामान नहीं, बल्कि जानलेवा हथियार बन चुका है। मकर संक्रांति जैसे पर्व पर, जब बड़े पैमाने पर पतंगबाजी होती है, यह खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
हाईकोर्ट ने इसी को देखते हुए अधिकारियों को विशेष निगरानी के निर्देश दिए हैं और साफ किया है कि चाइनीज मांझा बेचने या इस्तेमाल करने वालों पर गैर इरादतन हत्या तक का मामला दर्ज किया जाए। नाबालिगों द्वारा इसका उपयोग होने पर उनके अभिभावकों को जिम्मेदार ठहराने का निर्देश भी यह बताता है कि अब लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। शासन भले ही जनजागरूकता अभियानों और निगरानी की बात कर रहा हो, लेकिन हकीकत यह है कि खतरनाक मांझा आज भी बाजारों और गलियों में चोरी-छिपे मिल जाता है। यही कारण है कि हर साल पतंगबाजी के मौसम में हादसों की खबरें सुर्खियों में रहती हैं। जब तक प्रतिबंध सिर्फ फाइलों में सिमटा रहेगा, तब तक चाइनीज मांझा मौत का सामान बना ही रहेगा।
अब यह केवल प्रशासन या अदालत की जिम्मेदारी नहीं है। समाज को भी समझना होगा कि सस्ती खुशी के लिए किसी की जान जोखिम में डालना अपराध है। अगर सच में त्योहार की रौनक को सुरक्षित रखना है, तो चाइनीज मांझे के खिलाफ सामूहिक और कठोर रुख अपनाना ही होगा। तभी पतंगें आसमान में उड़ती पतंगें आनंद देंगी, और जिंदगियां सुरक्षित रहेंगी।







