राजधानी भोपाल में रविवार सुबह हुई पुलिस कार्रवाई ने यह स्पष्ट कर दिया कि संगठित अपराध चाहे जितना जड़ें जमा ले, कानून से ऊपर नहीं हो सकता। वर्षों से कुख्यात रहे निशातपुरा के ईरानी डेरे पर की गई यह सख्त कार्रवाई केवल एक पुलिस ऑपरेशन नहीं, बल्कि अपराध के उस समानांतर तंत्र पर करारा प्रहार है, जो लंबे समय से प्रशासनिक ढिलाई और सफेदपोशों के संरक्षण की छाया में फल-फूल रहा था। कार्रवाई के दौरान पुलिस से झूमाझटकी और पत्थरबाजी यह बताने के लिए पर्याप्त है कि अपराधियों के हौसले किस हद तक बुलंद थे। इसके बावजूद पुलिस ने संयम और दृढ़ता के साथ हालात को संभाला और लाठीचार्ज कर पूरे डेरे को खाली कराया। 10 महिलाओं समेत 32 आरोपियों की गिरफ्तारी और बड़ी मात्रा में चोरी का माल, विदेशी मुद्रा, फर्जी पहचान पत्र तथा नकली हथियारों की बरामदगी इस बात का प्रमाण है कि यह डेरा महज अवैध बस्ती नहीं, बल्कि अंतरराज्यीय अपराध का संगठित केंद्र था। सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि आरोपी नकली पुलिस बनकर देश के अलग-अलग राज्यों में वारदातों को अंजाम देते थे। इससे न केवल आम नागरिकों का भरोसा टूटता है, बल्कि पुलिस की साख पर भी प्रश्नचिह्न लगता है। ऐसे में यह कार्रवाई पुलिस भरोसे की पुनर्स्थापना की दिशा में एक अहम कदम मानी जानी चाहिए। हालांकि, यह भी आत्ममंथन का विषय है कि वर्षों से सक्रिय इस अपराधी नेटवर्क पर निर्णायक कार्रवाई में इतना विलंब क्यों हुआ? क्या स्थानीय स्तर पर समय रहते ठोस कार्रवाई होती, तो यह ईरानी अड्डा इतना बड़ा रूप ले पाता? पुलिस का यह मेगा ऑपरेशन स्वागतयोग्य है, लेकिन इसे स्थायी समाधान की शुरुआत बनाना होगा, न कि एक अपवाद। आवश्यक है कि इस कार्रवाई के बाद भी सतत निगरानी, त्वरित अभियोजन और राजनीतिक संरक्षण पर कठोर प्रहार किया जाए। तभी यह संदेश जाएगा कि राजधानी में अपराध के लिए अब कोई सुरक्षित ठिकाना नहीं है।







