मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से सामने आई एक सनसनीखेज घटना ने शहर की कानून-व्यवस्था, किशोर अपराध और सामाजिक माहौल, तीनों पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं। टीला जमालपुरा के एक स्नूकर क्लब में 10वीं कक्षा के छात्र पर उसके ही कोचिंग साथियों ने महज 30 सेकंड में 27 बार चाकू-छुरी से हमला कर दिया। वजह, कुछ दिन पहले हुआ थप्पड़ कांड और पूल गेम में वर्चस्व की कथित लड़ाई। खेल के मैदान में शुरू हुआ विवाद जिस तरह जानलेवा हिंसा में बदला, वह हमारी बदलती सामाजिक मानसिकता का चिंताजनक संकेत है। सबसे पहले सवाल यह है कि नाबालिगों के हाथों में इतनी आसानी से घातक हथियार कैसे पहुंच रहे हैं? क्या अभिभावकों, स्कूलों और समाज की निगरानी व्यवस्था इतनी कमजोर हो चुकी है कि 16 साल के बच्चे ‘फिल्मी अंदाज’ में हमले की योजना बनाकर उसे अंजाम दे दें? यह घटना केवल दो किशोरों की आपराधिक प्रवृत्ति नहीं, बल्कि उस वातावरण की उपज है जहां आक्रामकता को ताकत और बदले को स्वाभिमान समझ लिया गया है।
दूसरा और अधिक गंभीर प्रश्न पुलिस कार्रवाई पर है। प्रारंभिक तौर पर साधारण मारपीट की धाराओं में एफआईआर दर्ज कर आरोपियों को नोटिस देकर छोड़ देना, क्या इस जघन्य हमले की गंभीरता को कमतर आंकना नहीं है? जब 27 वार किए गए हों, उंगलियां कट गई हों और गहरे जख्म लगे हों, तब इसे सामान्य झगड़ा मानना न्याय की भावना को आहत करता है। निश्चित ही मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर धाराएं बढ़ाई जा सकती हैं, पर शुरुआती सख्ती भी उतनी ही जरूरी है, ताकि समाज को स्पष्ट संदेश जाए कि हिंसा किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं। यह घटना शिक्षा संस्थानों और कोचिंग सेंटरों के लिए भी चेतावनी है। प्रतिस्पर्धा और वर्चस्व की भावना यदि संवाद से नहीं सुलझेगी, तो वह हिंसा का रूप ले सकती है। जरूरत है कि स्कूल स्तर पर काउंसलिंग, नैतिक शिक्षा और क्रोध प्रबंधन को गंभीरता से लागू किया जाए। भोपाल की यह वारदात हमें याद दिलाती है कि यदि अभी भी हम नहीं चेते, तो खेल के क्लब और कक्षाएं अपराध की प्रयोगशाला बनती देर नहीं लगेगी। समाज, परिवार और प्रशासन-तीनों को मिलकर यह तय करना होगा कि अगला ’30 सेकंड’ किसी और मासूम की जिंदगी पर भारी न पड़े।







