मध्यप्रदेश की अदालतों से आए दो ताजा फैसलों ने साफ कर दिया है कि अब ‘जुगाड़’ की संस्कृति के लिए शिक्षा और चिकित्सा जैसे पवित्र क्षेत्रों में कोई जगह नहीं बची है। फर्जी डोमिसाइल प्रमाण पत्र के सहारे मेडिकल सीट हथियाने वाले दो डॉक्टरों को सजा सुनाकर न्यायपालिका ने केवल कानून लागू नहीं किया, बल्कि व्यवस्था को आईना भी दिखाया है। मेडिकल सीट कोई साधारण अवसर नहीं होती। यह वर्षों की मेहनत, प्रतियोगी परीक्षा का दबाव और लाखों सपनों का निचोड़ होती है। जब कोई व्यक्ति फर्जी दस्तावेजों के सहारे इस सीट पर कब्जा करता है, तो वह सिर्फ धोखाधड़ी नहीं करता, वह किसी योग्य छात्र का हक और भविष्य छीन लेता है।
अदालत की यह टिप्पणी बिल्कुल सटीक है कि यह अपराध व्यक्तिगत नहीं, सामाजिक है। इन मामलों की एक और अहम परत है समय। एक फैसले में 15 साल बाद सजा हुई। यह देरी हमारे न्यायिक ढांचे की चुनौतियों को भी उजागर करती है, लेकिन साथ ही यह उम्मीद भी जगाती है कि देर भले हो, पर अंधेर नहीं। यह संदेश खास तौर पर उन लोगों के लिए है जो सोचते हैं कि एक बार नौकरी मिल गई, तो मामला खत्म। चिंता की बात यह भी है कि जिन लोगों को समाज ने ‘डॉक्टर’ जैसी जिम्मेदार उपाधि दी, उन्होंने ही व्यवस्था में सेंध लगाई। डॉक्टर सिर्फ पेशा नहीं, भरोसा होता है।
अगर प्रवेश ही छल से हुआ हो, तो उस भरोसे की बुनियाद हिल जाती है। अदालत ने सख्त सजा देकर यही भरोसा फिर से मजबूत करने की कोशिश की है। अब सवाल सिर्फ सजा का नहीं, हमारी सड़ांध मारती व्यवस्था की पूर्ण रूपणे सफाई का है। प्रवेश प्रक्रियाओं की डिजिटल निगरानी, दस्तावेजों का मजबूत सत्यापन और दोषियों पर तत्काल कार्रवाई, ये कदम अनिवार्य हैं। वरना हर फर्जी सीट, किसी असली प्रतिभा की चुपचाप हत्या करती रहेगी। इन फैसलों ने स्पष्ट कर दिया है कि डिग्री पर लगा फर्जीवाड़े का दाग, देर-सबेर जेल की सलाखों तक पहुंचाता ही है।







