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Home राजनीतिक चिंतन

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का टैरिफ, क्या होगा भारत पर असर

Politics Mirror by Politics Mirror
August 5, 2025
in राजनीतिक चिंतन
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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का टैरिफ, क्या होगा भारत पर असर
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राजेंद्र दीक्षित

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत पर 25% से 27% के बीच रेसिप्रोकल टैरिफ (reciprocal tariff) लगाए हैं, जो विभिन्न क्षेत्रों को प्रभावित करते हैं। ये टैरिफ 1 अगस्त 2025 से लागू होने की घोषणा की गई थी, लेकिन कुछ स्रोतों के अनुसार इसे 7 अगस्त 2025 तक टाल दिया गया है। नीचे उन प्रमुख क्षेत्रों की सूची दी गई है, जिन पर इन टैरिफ का असर पड़ने की संभावना है-
समुद्री उत्पाद : सीफूड भारत का लगभग 40-50% झींगा निर्यात अमेरिका को जाता है, जिसका मूल्य 2024-25 में 4.88 अरब डॉलर था।मछली, मांस, और प्रसंस्कृत समुद्री भोजन: 2024 में इनका निर्यात 2.58 अरब डॉलर था।
वस्त्र उद्योग (टेक्सटाइल्स): टेक्सटाइल निर्यात पर टैरिफ का असर पड़ेगा, जिससे भारतीय कपड़े अमेरिकी बाजार में महंगे हो सकते हैं। इससे इंग्लैंड के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) से मिला लाभ इसे कम कर सकता है।
पेट्रोलियम उत्पाद: 2024-25 में भारत ने अमेरिका को 4.31 लाख करोड़ रुपये के पेट्रोलियम उत्पाद निर्यात किए।
रत्न और आभूषण: रत्न और कीमती पत्थरों का निर्यात, जिसका मूल्य 99,000 करोड़ रुपये था,
इलेक्ट्रॉनिक्स और टेलीकॉम उपकरण: 1.46 लाख करोड़ रुपये के टेलीकॉम उपकरणों के निर्यात पर टैरिफ का असर पड़ने की संभावना है।
रक्षा और ऊर्जा क्षेत्र: अमेरिका ने भारत के रूस से हथियार और कच्चा तेल खरीदने के कारण टैरिफ के साथ-साथ जुर्माना (पेनाल्टी) लगाने की धमकी दी है। हालांकि, जुर्माने की राशि स्पष्ट नहीं की गई है।
राहत: फार्मास्यूटिकल्स: कुछ स्रोतों के अनुसार, दवाओं को रेसिप्रोकल टैरिफ से बाहर रखा गया है, जिससे भारतीय फार्मा उद्योग को राहत मिल सकती है। प्रतिउत्तर में भारत ने भी कार्रवाई की धमकी दी है, जिसमें अमेरिका से आयातित विनिर्माण और ऊर्जा उत्पादों (जैसे तरलीकृत प्राकृतिक गैस, कच्चा तेल, कोयला) पर टैरिफ शामिल हो सकते हैं। परन्तु अभी भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक वार्ता जारी है, और टैरिफ को 7 अगस्त 2025 तक टालने का फैसला दोनों देशों के बीच चल रही चर्चा का परिणाम हो सकता है।
टैरिफ का असर भारतीय निर्यातकों, विशेष रूप से छोटे और मध्यम उद्यमों, पर पड़ सकता है, जिससे उनकी प्रतिस्पर्धात्मकता कम हो सकती है। साथ ही, अमेरिकी उपभोक्ताओं को स्मार्टफोन, कपड़े, और जेनेरिक दवाओं की कीमतों में लगभग 17% तक की वृद्धि का सामना करना पड़ सकता है।

भारत पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों का इतिहास: 1974 का प्रथम परमाणु परीक्षण (स्माइलिंग बुद्धा)
18 मई 1974 को भारत ने राजस्थान के पोखरण में अपना पहला परमाणु परीक्षण “स्माइलिंग बुद्धा” किया। यह भारत का पहला परमाणु परीक्षण था, जिसे शांतिपूर्ण परमाणु विस्फोट (Peaceful Nuclear Explosion) के रूप में प्रस्तुत किया गया।
तब अमेरिका ने भारत पर कई प्रतिबंध लगाए, जिसमें सैन्य और आर्थिक सहायता में कटौती शामिल थी। परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (NSG) ने भारत को परमाणु प्रौद्योगिकी और सामग्री की आपूर्ति पर प्रतिबंध लगा दिया। भारत ने कनाडा से प्राप्त तकनीक का उपयोग इस परीक्षण में किया था, जिसके बाद कनाडा ने भारत के साथ परमाणु सहयोग समाप्त कर दिया। इन प्रतिबंधों ने भारत के परमाणु कार्यक्रम को धीमा कर दिया, लेकिन भारत ने स्वदेशी तकनीक विकसित करने पर ध्यान केंद्रित किया।

1998 के पोखरण-II परमाणु परीक्षण
11 और 13 मई 1998 को भारत ने पोखरण में पांच परमाणु परीक्षण किए, जिसके बाद भारत ने खुद को परमाणु हथियार संपन्न राष्ट्र घोषित किया। तब भी अमेरिका राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने भारत पर व्यापक प्रतिबंध लगाए, जिसमें सैन्य सहायता, रक्षा निर्यात, $1.17 बिलियन के ऋण पर रोक, और दोहरे उपयोग (dual-use) प्रौद्योगिकी की आपूर्ति पर प्रतिबंध शामिल थे। इसके साथ ही जापान ने भारत पर सात साल तक प्रतिबंध लगाए, जिसमें आर्थिक सहायता और व्यापार पर प्रतिबंध शामिल थे। अन्य देशो में ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, और कुछ यूरोपीय देशों ने भी आर्थिक और तकनीकी प्रतिबंध लगाए। इन प्रतिबंधों ने भारत के रक्षा और तकनीकी क्षेत्र को प्रभावित किया, लेकिन भारत ने स्वदेशी अनुसंधान और विकास (R&D) को बढ़ावा दिया, जिसके परिणामस्वरूप स्वदेशी रक्षा उपकरण और तकनीक का विकास हुआ। 2000 तक कई देशों ने प्रतिबंधों को धीरे-धीरे हटा लिया, क्योंकि भारत ने परमाणु अप्रसार संधि (NPT) के बाहर रहते हुए भी जिम्मेदार परमाणु नीति अपनाई। अपितु फ्रांस ने भारत के परमाणु परीक्षण के अधिकार का समर्थन किया और प्रतिबंध लगाने से इंकार कर दिया।
उपरोक्त प्रतिबंधों ने भारत को आर्थिक और तकनीकी रूप से प्रभावित तो किया, लेकिन भारत ने स्वदेशी तकनीक और अनुसंधान पर ध्यान केंद्रित करके इनका सामना किया।
– 2008 में भारत-अमेरिका परमाणु समझौते और NSG छूट के बाद भारत को परमाणु व्यापार में वैश्विक एकीकरण मिला, जिसने 1974 और 1998 के प्रतिबंधों के प्रभाव को काफी हद तक समाप्त कर दिया।

स्वदेशीकरण समाधान

स्वदेशीकरण का अर्थ है भारत में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देना, विशेष रूप से आर्थिक, औद्योगिक, और सामरिक क्षेत्रों में। यह विचार भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान स्वदेशी आंदोलन से उत्पन्न हुआ, जिसका उद्देश्य विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार और स्थानीय उत्पादन को प्रोत्साहन देना था। वर्तमान में, स्वदेशीकरण का तात्पर्य ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान से है, जिसे 2020 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुरू किया। इसका लक्ष्य भारत को विनिर्माण, रक्षा, प्रौद्योगिकी, और अन्य क्षेत्रों में आत्मनिर्भर बनाना है। आर्थिक स्वदेशीकरण: भारत ने मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया, और स्टार्टअप इंडिया जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से स्वदेशी उत्पादन को बढ़ावा दिया है। उदाहरण के लिए, स्मार्टफोन और इलेक्ट्रॉनिक्स के क्षेत्र में कई कंपनियां (जैसे सैमसंग, श्याओमी) भारत में विनिर्माण इकाइयां स्थापित कर रही हैं।

रक्षा क्षेत्र में स्वदेशीकरण

भारत ने रक्षा उपकरणों, जैसे तेजस लड़ाकू विमान, अर्जुन टैंक, और स्वदेशी मिसाइल प्रणालियों (ब्रह्मोस, आकाश) के विकास पर जोर दिया है। इसका उद्देश्य विदेशी रक्षा आयात पर निर्भरता कम करना है।
कृषि और अन्य क्षेत्र: भारत ने कृषि में आत्मनिर्भरता हासिल की है, और अब जैव प्रौद्योगिकी, हरित ऊर्जा, और अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी (जैसे चंद्रयान मिशन) में भी प्रगति की है। स्वदेशीकरण के बावजूद, कुछ क्षेत्रों (जैसे सेमीकंडक्टर, उन्नत प्रौद्योगिकी) में भारत अभी भी आयात पर निर्भर है। अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध और आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान इस प्रक्रिया को जटिल बनाते हैं। अंततः भारत का स्वदेशीकरण अभियान आत्मनिर्भरता और वैश्विक मंच पर मजबूत स्थिति बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम होंगा।

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