-महेश दीक्षित
डिजिटल युग में सोशल मीडिया अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है, लेकिन जब यही मंच अफवाह, नफरत और उकसावे का हथियार बन जाए, तो उस पर नकेल कसना समय की मांग बन जाती है। भोपाल में सोशल मीडिया पर भडक़ाऊ पोस्ट, वीडियो और कमेंट्स के खिलाफ पुलिस आयुक्त का सख्त आदेश इसी सच्चाई को रेखांकित करता है कि आभासी दुनिया की आग वास्तविक दुनिया को भी जला सकती है। बीते कुछ वर्षों में देशभर में ऐसी अनेक घटनाएं सामने आई हैं, जहां सोशल मीडिया पर फैलाई गई भ्रामक या उकसाने वाली सूचनाओं ने साम्प्रदायिक तनाव, हिंसा और कानून-व्यवस्था की गंभीर स्थिति पैदा की। एक झूठी खबर, छेड़छाड़ किया गया वीडियो या भावनात्मक पोस्ट देखते ही देखते सैकड़ों, हजारों लोगों तक पहुंच जाती है और लोग बिना सत्य जाने प्रतिक्रिया देने लगते हैं। यही अराजकता का मूल कारण बनती है। ऐसे में प्रशासन का यह कहना बिल्कुल सही है कि समय रहते सख्ती नहीं बरती गई, तो हालात नियंत्रण से बाहर हो सकते हैं।
इस आदेश का सबसे अहम पहलू यह है कि इसमें केवल पोस्ट करने वालों पर ही नहीं, बल्कि लाइक, शेयर, फॉरवर्ड और उकसाने वाले कमेंट करने वालों को भी जिम्मेदार ठहराया गया है। अक्सर देखा जाता है कि मूल पोस्ट से ज्यादा जहर उस पर होने वाले कमेंट्स और क्रॉस कमेंट्स फैलाते हैं। यही ‘सोशल मीडिया वॉर’ धीरे-धीरे सडक़ों पर टकराव में बदल जाती है। इस प्रवृत्ति पर अंकुश लगाना बेहद जरूरी था।
ग्रुप एडमिन की जिम्मेदारी तय करना भी एक महत्वपूर्ण और व्यावहारिक कदम है। सोशल मीडिया ग्रुप आज मोहल्ले या समुदाय की तरह काम करने लगे हैं। यदि एडमिन सजग रहें और आपत्तिजनक कंटेंट को तुरंत हटाएं, तो कई विवाद जन्म लेने से पहले ही खत्म हो सकते हैं। इसी तरह साइबर कैफे पर सख्ती गुमनाम रूप से फैलाए जाने वाले जहर को रोकने की दिशा में अहम है।
हालांकि, यह भी उतना ही जरूरी है कि इस सख्ती का इस्तेमाल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को दबाने के लिए न हो। आलोचना, असहमति और तथ्य परक राय लोकतंत्र की आत्मा है। फर्क सिर्फ इतना है कि स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी होनी चाहिए। समाज को यह समझना होगा कि कीबोर्ड के पीछे बैठकर कही गई बात भी उतनी ही असरदार और जवाबदेह होती है, जितनी सार्वजनिक मंच से कही गई। कुल मिलाकर, सोशल मीडिया की भडक़ाऊ पोस्ट पर नकेल कसना जरूरी है। यह कदम किसी की आवाज दबाने के लिए नहीं, बल्कि शहर, समाज की शांति, सौहार्द और कानून-व्यवस्था की रक्षा के लिए है। अब जिम्मेदारी नागरिकों की भी है कि वे अफवाह नहीं, विवेक साझा करें।







