लोकतंत्र की मजबूती का पैमाना मतदान प्रतिशत माना जाता है। इसी उद्देश्य से चुनाव आयोग हर चुनाव से पहले स्वीप जैसी जागरूकता गतिविधियां चलाता है, ताकि ज्यादा से ज्यादा मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करें। लेकिन आने वाले चुनाव से पहले मध्यप्रदेश, खासकर राजधानी भोपाल में जिस तरह की स्थिति बन रही है, वह मतदान प्रतिशत बढ़ाने के बजाय उसे प्रभावित कर सकती है।
मतदाता सूचियों में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के बाद प्रदेश में 83 लाख 20 हजार से ज्यादा मतदाताओं के पोलिंग बूथ बदल दिए गए हैं। इसका मुख्य कारण चुनाव आयोग की वह हिदायत है, जिसके तहत हर मतदान केंद्र पर अधिकतम 1200 मतदाता ही होने चाहिए। नतीजतन राज्यभर में 6,934 नए पोलिंग बूथ बनाए गए। भोपाल जिले में ही 260 नए बूथ बढ़े हैं और 2 लाख से ज्यादा वोटर्स को नए मतदान केंद्रों से जोड़ दिया गया है। समस्या यह नहीं है कि बूथ बढ़े, बल्कि परेशानी यह है कि मतदाताओं के पास मौजूद ईपिक कार्ड और नई वोटर लिस्ट में अलग-अलग पोलिंग बूथ दर्ज हैं। यानी मतदाता अगर अपने कार्ड के भरोसे मतदान केंद्र पहुंचा, तो वहां उसका नाम न मिलने की पूरी आशंका है।
23 दिसंबर को जारी ड्राफ्ट वोटर लिस्ट नए 2289 मतदान केंद्रों के हिसाब से बनी है, जबकि ईपिक में पुरानी जानकारी दर्ज है। चुनाव आयोग ने अब तक यह स्पष्ट नहीं किया है कि बदले गए बूथों की जानकारी ईपिक कार्ड में कब और कैसे अपडेट होगी। इस असमंजस का सीधा असर चुनाव के दिन देखने को मिल सकता है। मतदाता पुराने बूथ पर पहुंचेंगे, सही केंद्र खोजने में समय बर्बाद होगा, कई लोग मतदान का समय चूक सकते हैं। बीएलओ और चुनाव कर्मियों पर अतिरिक्त दबाव बनेगा और अव्यवस्था की स्थिति पैदा हो सकती है। यह स्थिति उस समय और गंभीर हो जाती है, जब भोपाल में ही एसआईआर के बाद 4 लाख 38 हजार से ज्यादा नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए हैं, जिनमें बड़ी संख्या नो-मैपिंग वोटर्स की है। लोकतंत्र में सुधार जरूरी है, लेकिन सुधार अगर मतदाता को भ्रमित कर दे, तो उसका उद्देश्य ही कमजोर पड़ जाता है। चुनाव आयोग को चाहिए कि मतदान से पहले स्पष्ट, व्यापक और आक्रामक स्तर पर नई जानकारी मतदाताओं तक पहुंचाए। वरना ‘अधिक बूथ’ की सुविधा, मतदान में बाधा बनकर लोकतंत्र को ही नुकसान पहुंचा सकती है। चुनाव कराने का ध्येय ही लांछित हो सकता है।







