मध्य प्रदेश में लगातार बढ़ते बाल अपराध अब सिर्फ सामाजिक चिंता नहीं, बल्कि प्रशासनिक चुनौती बन चुके हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की रिपोर्ट यह साफ बताती है कि बच्चों के खिलाफ अपराधों के मामलों में मध्य प्रदेश देश में शीर्ष पर है। साल 2023 में जहां देशभर में 1.77 लाख से अधिक मामले दर्ज हुए, वहीं अकेले मप्र में 22,393 प्रकरण सामने आए। यह आंकड़ा न केवल चौंकाने वाला है, बल्कि यह भी बताता है कि अब परंपरागत तरीकों से आगे बढक़र तकनीक आधारित समाधान अपनाने की जरूरत है। इसी पृष्ठभूमि में 250 से अधिक बाल अधिकार संगठनों के संयुक्त मंच ‘जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन’ द्वारा एआई से लैस ‘रक्षा एप’ का लॉन्च एक उम्मीद की किरण के रूप में देखा जाना चाहिए। यह एप बाल विवाह, बच्चों की तस्करी और ऑनलाइन यौन शोषण जैसे संवेदनशील अपराधों की पहचान और निगरानी में मदद करेगा। खास बात यह है कि एप न सिर्फ घटनाओं पर प्रतिक्रिया देगा, बल्कि संभावित जोखिम वाले क्षेत्रों और समूहों की पहले से मैपिंग कर रोकथाम पर जोर देगा। राजधानी भोपाल में बाल अपराधों की 6त्न दर और 1354 मामलों का दर्ज होना बताता है कि शहरी क्षेत्र भी सुरक्षित नहीं हैं। इंदौर और रीवा जैसे शहरों में भी स्थिति चिंताजनक है। ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में बाल विवाह अब भी एक बड़ी सामाजिक बुराई बना हुआ है। राजगढ़, श्योपुर और छतरपुर जैसे जिलों में बाल विवाह की दर आज भी राष्ट्रीय औसत से कहीं अधिक है, जो जमीनी प्रशासनिक प्रयासों की खोलती है। जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन के आंकड़े बताते हैं कि बीते दो वर्षों में 36 हजार से अधिक बाल विवाह रुकवाए गए और हजारों बच्चों को तस्करी से मुक्त कराया गया। यह साबित करता है कि यदि सही रणनीति और संसाधन मिलें, तो बदलाव संभव है। रक्षा एप जैसे तकनीकी उपाय इस लड़ाई को और मजबूत बना सकते हैं, बशर्ते सरकार, पुलिस और समाज मिलकर इसका प्रभावी उपयोग करें। और फिर, तकनीक केवल एक औजार है। असली सफलता तभी मिलेगी जब प्रशासनिक इच्छाशक्ति, सामाजिक जागरूकता और सामुदायिक सहभागिता एक साथ आगे बढ़ें। बच्चों की सुरक्षा किसी एक संस्था की नहीं, बल्कि पूरे समाज की जिम्मेदारी है।







