महेश दीक्षित
भोपाल। राजधानी भोपाल के स्लॉटर हाउस विवाद में अब तक हुई कार्रवाई यह साफ संकेत देती है कि कुछ लोगों को निलंबित कर देना भरोसा बहाल करने के लिए काफी नहीं है। संदिग्ध वेटनरी डॉक्टर सहित दर्जनभर अधिकारियों–कर्मचारियों पर गाज जरूर गिरी, लेकिन मामले के मुख्य आरोपी असलम चमड़ा का करीबी साथी अब भी पुलिस की गिरफ्त से बाहर है। इससे यह धारणा और मजबूत होती है कि कार्रवाई छोटे-मोटे लोगों तक सीमित है, जबकि असली गुनहगारों और जिम्मेदारों की गिरेबान पर हाथ डालने से परहेज किया जा रहा है। इसी पृष्ठभूमि में महापौर की भूमिका पर उठ रहे सवाल और भी अहम हो जाते हैं। ये सवाल ऐसे नहीं हैं जिन्हें ठंडे बस्ते में डाल दिया जाए। स्लॉटर हाउस के संचालन की अनुमति, परिषद को विश्वास में न लेना और पूरे प्रकरण पर देर से प्रतिक्रिया, इन सबने संदेह की परतें और गहरी कर दी हैं।
गोमांस के आरोपों ने इस मामले को केवल कानून-व्यवस्था या धार्मिक संवेदनशीलता का नहीं रहने दिया। गोहत्या जैसे अत्यंत गंभीर और समाज को झकझोरने वाले अपराध पर सवाल उठना स्वाभाविक है। सवाल यही है कि इस पाप को कब तक दबाया जाएगा और इसके गुनहगारों को आखिर कब तक बचाया जाता रहेगा। यह पूरा प्रकरण अब नगर निगम की कार्यप्रणाली, पारदर्शिता और जवाबदेही की सीधी कसौटी बन चुका है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि स्लॉटर हाउस के संचालन की अनुमति और उससे जुड़े निर्णय परिषद के सामने क्यों नहीं रखे गए। महापौर का तर्क है कि पीपीपी मॉडल पर बने इस स्लॉटर हाउस में निगम की राशि खर्च नहीं हुई और पूरी प्रक्रिया प्रशासक कार्यकाल में पूरी हो चुकी थी, इसलिए परिषद में लाने की आवश्यकता नहीं थी। लेकिन शहर से जुड़ा इतना संवेदनशील विषय निर्वाचित महापौर परिषद की जानकारी और बहस से बाहर रहे, यह लोकतांत्रिक भावना के विपरीत लगता है।
परिषद की बैठक में निगम अध्यक्ष किशन सूर्यवंशी का यह आरोप भी गंभीर है कि अब तक की कार्रवाई या तो हिंदू संगठनों की पहल पर हुई है या पुलिस ने की है। नगर निगम की ओर से स्वयं स्लॉटर हाउस संचालक असलम चमड़ा के खिलाफ एफआईआर दर्ज न कराना भी कई सवाल खड़े करता है। यदि असलम यह दावा कर रहा है कि संचालन नगर निगम कर रहा है, तो निगम का पीपीपी का हवाला देकर जिम्मेदारी से बचना संदेह को और बढ़ाता है। मानवाधिकार आयोग की जांच और क्लीनचिट को लेकर उठे हितों के टकराव के आरोपों ने विवाद को और उलझा दिया है। भले ही जांच रिपोर्ट कुछ और कहती हो, लेकिन पारदर्शिता के अभाव में शंकाएं खत्म नहीं होतीं। रोहिंग्या कामगारों से जुड़े आरोप और उनकी जांच भी यह दिखाती है कि स्लॉटर हाउस से जुड़ा निगरानी और नियंत्रण तंत्र कमजोर है।
स्पष्ट है कि कुछेक छोटे-मोटे अधिकारियों-कर्मचारियों के निलंबन और अधूरी कार्रवाई से जनता का भरोसा नहीं लौटेगा। जब तक असली गुनहगारों की पहचान कर उनकी जवाबदेही तय नहीं होती, परिषद को विश्वास में लेकर निष्पक्ष और ठोस कार्रवाई नहीं होती, तब तक यह विवाद शांत नहीं होगा। अन्यथा, स्लॉटर हाउस का यह मामला व्यवस्था पर लगा एक बदनुमा दाग बनकर रह जाएगा।







