भोपाल में पुलिस नेतृत्व का बदलाव ऐसे समय हुआ है जब शहर कई मोर्चों पर दबाव झेल रहा है। पुराने पुलिस कमिश्नर हरिनारायण चारी मिश्र की विदाई के साथ नए कमिश्नर संजय कुमार ने पदभार संभाल लिया है। यह परिवर्तन महज प्रशासनिक औपचारिकता नहीं, बल्कि राजधानी की कानून-व्यवस्था के लिए एक नई दिशा तय करने का अवसर भी है। भोपाल अब सीमित दायरे वाला शांत शहर नहीं रहा। तेजी से बढ़ती आबादी और फैलते भौगोलिक विस्तार ने पुलिस व्यवस्था की चुनौतियां कई गुना बढ़ा दी हैं। अपराधों का ग्राफ ऊपर जा रहा है, जिनमें पारंपरिक अपराधों के साथ साइबर अपराध, नशे का नेटवर्क और संगठित गिरोहों की गतिविधियां भी शामिल हैं। ऐसे में पुलिस की भूमिका केवल प्रतिक्रिया देने वाली नहीं, बल्कि रणनीतिक और तकनीकी रूप से सक्षम होने की भी है।
आम नागरिक की नजर से देखें तो सबसे बड़ी परेशानी रोजमर्रा की अव्यवस्था है-विशेषकर ट्रैफिक। पुराने भोपाल की सडक़ों पर हालात इतने बेकाबू हैं कि ट्रैफिक व्यवस्था मानो अस्तित्वहीन हो गई लगती है। जाम, अव्यवस्थित पार्किंग और नियमों की अनदेखी ने न केवल यातायात को अवरुद्ध किया है, बल्कि आपात स्थितियों में जोखिम भी बढ़ाया है। यह समस्या व्यवस्था की प्राथमिकता सूची में ऊपर दिखनी चाहिए। लेकिन इन सबके बीच सबसे गहरी चुनौती है-जनता में विश्वास का संकट। समाज में यह धारणा तेजी से पनप रही है कि कानून का असर कमजोरों पर ज्यादा और रसूखदारों पर कम दिखता है। यदि पुलिस की छवि निष्पक्ष और निर्भीक नहीं बनती, तो कानून का सम्मान भी धीरे-धीरे कम होता जाता है। यह स्थिति किसी भी शहर के सामाजिक संतुलन के लिए ठीक नहीं।
नए कमिश्नर संजय कुमार के सामने इसलिए दोहरी जिम्मेदारी है-अपराध नियंत्रण और भरोसे का निर्माण। सख्त कार्रवाई के साथ पारदर्शिता, तकनीक के साथ संवेदनशीलता और शक्ति के साथ निष्पक्षता, यही संतुलन उन्हें स्थापित करना होगा। उन्हें थानों की कार्यसंस्कृति सुधारने, बीट पुलिसिंग मजबूत करने, महिला सुरक्षा और साइबर हेल्प सिस्टम को प्रभावी बनाने जैसे ठोस कदम भी प्राथमिकता में रखने होंगे। राजधानी आज ऐसी पुलिसिंग चाहती है जो केवल दिखे नहीं, बल्कि लोगों को महसूस भी हो कि पुलिस सचमुच उनके साथ खड़ी है।







